jara sochiye

समाज में व्याप्त विक्रतियों को संज्ञान में लाना और उनमे सुधार के प्रयास करना ही मेरे ब्लोग्स का उद्देश्य है.

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SATYA SHEEL AGRAWAL


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कन्या भ्रूण हत्या के वास्तविक कारण

Posted On: 14 Aug, 2016  
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Social Issues में

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विश्व व्यापी आतंकवाद और मुस्लिम समाज

Posted On: 1 Aug, 2016  
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Junction Forum Social Issues में

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आरक्षण बना गले की हड्डी

Posted On: 22 Jun, 2016  
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Junction Forum Politics में

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राजनीति का अपराधीकरण

Posted On: 18 May, 2016  
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Junction Forum Politics में

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सरकारी पेशन देश की गरीब जनता के साथ मजाक

Posted On: 10 Apr, 2016  
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Junction Forum social issues में

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छद्म धर्मनिरपेक्षता की राजनीति

Posted On: 28 Mar, 2016  
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Junction Forum Social Issues मेट्रो लाइफ में

4 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आपके विचार ठीक हैं सत्यशील जी । हमारे निर्दोष बालक जो इस मानवीय भेदभाव से पूरी तरह अछूते हैं, जब इस विभाजनकारी एवं विनाशकारी व्यवस्था के पीड़क तथ्य से परिचित होते हैं, तो उन पर क्या बीतती है, यह कोई संवेदनशील व्यक्ति ही समझ सकता है, इस व्यवस्था का अनुचित लाभ उठाते हुए इसे अनंतकाल तक चलाए रखने के इच्छुक लोग नहीं समझ सकते । इस व्यवस्था ने समाज और राष्ट्र दोनों के ही हितों को अपूर्णनीय क्षति पहुंचा दी है । लेकिन अब यह संभवतः कभी समाप्त नहीं हो सकेगी क्योंकि अपने चुनावी लाभ-हानि से ऊपर उठाकर इसे समाप्त करने या इसकी निष्पक्ष समीक्षा तक करने का नैतिक साहस किसी भी राजनीतिक दल या राजनेता में नहीं है । नेपोलियन के शब्दकोश में 'असंभव' शब्द नहीं था क्योंकि वह किसी भी कार्य को असंभव नहीं मानता था । यदि आज वह जीवित होता तो देखता कि भारत से आरक्षण का उन्मूलन असंभव ही है । हमारे यहाँ 'सत्यमेव जयते' का जयघोष स्थान-स्थान पर किया जाता है किन्तु सत्य की सबसे बड़ी पराजय तो आरक्षण की उत्तरजीविता में ही निहित है । इस व्यवस्था को सदैव कायम रखने के लिए अंबेडकर के नाम की माला भी खूब जपी जा रही है जबकि स्वाभिमान को सर्वोपरि रखने वाले अंबेडकर ने ही इस व्यवस्था को अस्थायी रूप दिया था क्योंकि वे इसके स्थायित्व के नकारात्मक परिणामों को समझते थे । संभवतः इसीलिए कुछ दिनों पूर्व भारत के प्रधानमंत्री भूलवश यह सत्य अपने मुख से उच्चारित कर बैठे थे कि आज स्वयं अंबेडकर भी आ जाएं तो वे भी इस व्यवस्था को समाप्त नहीं कर सकते । इस व्यवस्था के प्रति प्रधानमंत्री सहित सभी राजनेताओं एवं दलों एवं साथ ही कथित दलित एवं पिछड़े विचारकों एवं संगठनों का यह दृष्टिकोण देश का दुर्भाग्य ही है जिसे सहते रहना देश की नियति है ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

आदरणीय सत्यशील जी सादर नमस्कार, सच कहा है आपने जो नीति मात्र १० वर्षों के लिए बनायी गई थी उसकी गुंजाइश ने उसे सैकड़ों साल के लिए बना कर रख दिया है. कोई भी दल उसपर पुनर्विचार का प्रयास भी नहीं करना चाहता. हद तो तब हो गई है जब इसका सहारा पदोन्नति में भी लिया जाने लगा और जब न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है की पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए इस नीति में नहीं कहा गया है तो सरकार में बैठे दल उसे दरकिनार कर किस तरह पदोन्नति में आरक्षण मिलता रहे इस पर सक्रीय हो गए हैं. आपने आरक्षण विकास के लिए घातक कहा है मैं इसे मानव समाज के लिए भी घातक मानता हूँ. जो लोग वाकई पिछड़े हैं जिनको आज भी आरक्षण की आवश्यकता है उनको आरक्षण मिलना चाहिए किन्तु मात्र जाति ही इसका आधार नहीं रहे. जाति के नाम पर जो धनाढ्य वर्ग इसका अनुचित उपयोग कर रहा है उन लोगों से जैसे गैस सब्सिडी छीनी गई उसी तरह आरक्षण भी छीन लेने की आवश्यकता है. इस विस्तृत आलेख के लिए साधुवाद. आज कई सोशल साइट्स पर इसकी चर्चा तो जोरों पर है किन्तु सरकार में बैठे दलों पर इसका कोई सीधा असर होता नहीं दीख रहा है.

के द्वारा:

आदरणीय अग्रवाल साहब, सादर अभिवादन! आपकी चिंता जायज है, कानून बनकर मीडिया पर प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए. सही है, पर कानून बन जाने से ही तुरंत पालन होने लगता है? वैसे भी प्रेस कौंसिल है इसपर नियंत्रण के लिए पर वह कितना नियंत्रण रख पाता है यह भी पाता है. कोई चैनल जब सरकार का गुणगान करता है तो उसे पारितोषिक भी मिलता है. दुसरे चैनल शायद उनकी फाउंडिंग कहीं और से होती होगी तो वे सरकार के अवगुण ढूढने लगते हैं. असल निर्णायक तो जनता या कहें समझदार जनता होती है. मगर समझदार जनता किसे मन जाय. सभी किसी न किसी पार्टी ले समर्थक या विरोधी हैं. तात्पर्य यही है की हमलोग सिर्फ चिंता ही जाहिर कर सकते हैं. सोसल मीडिया पर भी पार्टियों के गट बने हुए हैं. इसीलिये जनता को ही फैसला करने दीजिये. सरकार का काम है की कैसे अपराध रुके, और विकास सब तक पहुंचे. अगर मैं गलत हूँ तो बताएं! सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

के द्वारा:

के द्वारा: OM DIKSHIT OM DIKSHIT

आदरणीय सत्य शील जी सादर प्रणाम, आपका लेख सहरानीय और तथ्य परक है परन्तु एक शंका भी उभरती है आपके कथनानुसार हमारे देश में विद्यमान अधिकतर मुसलमान ऐसे ही हैं जिनके पुरखों ने धर्म परिवर्तन कर लिया था, अर्थात वे आज भी हिन्दू मूल के व्यक्ति ही हैं,जिनकी विचार धारा हिन्दू ही है. अतः यदि उन्हें घर वापसी का मौका दिया जाता है और वे अपने पुरखों द्वारा मजबूरी में उठाए गए कदम को सुधारना चाहते हैं.यानि अपने वास्तविक घर अर्थात हिन्दू धर्म को स्वीकार करना चाहते हैं, तो इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है.कुछ समय पूर्व तक तो हिन्दू धर्म किसी अन्य धर्मावलम्बी को अपने धर्म में प्रवेश करने की इजाजत भी नहीं देता था अर्थात धर्म परिवर्तन अवांछनीय था.परन्तु अब हिन्दू धर्म भी सबको अवसर प्रदान कर रहा है की कोई भी धर्म का अनुयायी हिन्दू धर्म को स्वीकार कर सकता है.उनका यही बदला हुआ आचरण मुस्लिम और ईसाई धर्म को रास नहीं आ रहा,उन्हें हिदुओं का यह व्यवहार साम्प्रदायिक लग रहा है.जब वे सदियों से यही कार्य करते आ रहे थे तो वह साम्प्रदायिक नहीं था, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता तो क्या सैंकड़ो वर्षो से अपने अपने परवर्तित धर्मों का आदर करने वाले कन्वर्टिड सभी हिन्दुओं को आप हिन्दुत्त्व के रंग में रंग कर फिर से उन्हें हिन्दू धर्म में वापस लाकर उनको वह सम्मान दिला सकते है जिसके वह वास्तिविक हकदार है क्या धर्म परिवर्तन से वह विशुद्ध भारतीय बन जायेंगे या उनका वाही हाल होगा की धोबी का कुत्ता घर का न घाट ? धन्यवाद

के द्वारा:

के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

समाज की उन्नति का कारण बनता है, परन्तु हैवान मानव मात्र का दुश्मन होता है, उसका जीवन समाज के लिए बोझ एवं पीड़ादायक होता है। ‘इंसानियत’ ही देश, समाज, विश्व की उन्नति में सहायक होती है। इंसान ही अपने परिवार, समाज, देश और विश्व का निर्माण कर सकते हैं। मनुष्य जाति को सुविधाएँ उपलब्ध करा सकते हैं। दूसरी तरफ हैवान सिर्फ विध्वंस ही कर सकता है। विकास की गति को उल्टी दिशा देता है। अतः मानव विकास, विश्व शांति के लिए हैवानियत का अंत कर इंसान (मानवता) और इंसानियत का परचम लहराना मानव कल्याण के लिए आवश्यक है। अन्त में बाबा ने अपने शिष्यों से कोई प्रश्न पूछने का आग्रह किया। जब दोनों चेलों ने अपना कोई प्रश्न न करने को कहा तो बाबा ने अगला विषय प्रारम्भ कर दिया। विषयपरक बहुत बेहतर लेखन है आपका श्री सत्यशील अग्रवाल जी ! आपने अलग अलग पॉइंट लेकर विषय को और बेहतरीन , रोचक और पठनीय बना दिया है ! सार्थक लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

.अग्रवाल जी आपका चिंतन उत्तम है किन्तु हमारी राष्ट्रीय धर्म ग्रन्थ गीता कहती है कि.....”.रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है ,यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघाने वाला और बड़ा पापी है इसको ही तू पापाचरण का प्रेरक वैरी जान | अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले काम रूप वैरी के द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढंका हुआ है | इन्द्रियां ,मन और बुद्धि ..ये सब इसके वास स्थान कहे जाते हैं यह काम इन मन बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है | .विषयों का चिंतन करने से उन विषयों मैं आशक्ति हो जाती है ,आशक्ति से उन विषयों मैं कामना उत्पन्न हो जाती है | कामना मैं विद्धन पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है | क्रोध से अत्यंत मूड भाव पैदा होता है ,मूढ़भाव से स्मृति मैं भ्रम ,भ्रम से बुद्धि अर्थात ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से अपनी स्तिथि से गिर जाता है | ………………………………………...इसलिए हे अर्जुन तू पहिले इन्द्रियों को वश मैं करके इस ज्ञान विज्ञानं का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल | ..………इन्द्रियों को स्थूल शरीर से श्रेष्ठ ,बलवान और सूक्ष्म कहते हैं ,इन इन्द्रियों से पर मन है ,मन से पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यंत पर है ..वह आत्मा है | ………………...इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म ,बलवान ,और श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश मैं करके तू इस काम रूप दुर्जय शत्रु को मार डाल |.....ओम शांति शांति शांति

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

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के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

आदरणीय अग्रवाल जी,स्वतंत्रता दिवस की बधाई.आप की बाते बिलकुल सही हैं,ईमानदार व्यापारियों को हर प्रकार की सुरक्षा मिलनी ही चाहिए. मेरे विचार से आज का व्यापारी बहुत जागरूक है.व्यापारी ही नहीं सभी टैक्स देते हैं.अप्रत्यक्ष कर ,व्यापारी जनता से वसूल कर जमा करता है,ऐसे में उसको 'टैक्स-कस्टोडियन' माना जाता है ,लेकिन कुछ व्यापारी ,ईमानदार व्यापारियों की छवि को भी धूमिल करने में सहायक होते हैं.इसी कारण भ्रष्ट अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न होता है.मेरे विचार से सभी ईमानदार व्यापारियों को एक-जुट होकर भ्रष्ट -प्रशासन और जमाख़ोर तथा मिलावट करनेवाले व्यापारियों का विरोध करना चाहिए.इसमें आत्मावलोकन की भी महती आवश्यकता है.

के द्वारा: OM DIKSHIT OM DIKSHIT

गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए यदि आप भी ऐसा चाहते है, तो निम्न लिखित पत्र प्रधानमंत्री को pmo@nic.in पर पर भेजे। सेवा में, माननीय प्रधान मंत्री महोदय, भारत सरकार, नई दिल्ली। विषय :- गाय माता को राष्ट्रीय पशु बनाने हेतु। मान्यवर, गुरु पूर्णिमा १२ जुलाई २०१४ की पूर्व संध्या पर बाबा जय गुरुदेव गुरु पूर्णिमा सत्संग समारोह स्थल, नेशनल हाईवे - ८, अजमेर रोड, रामचन्द्रपुरा, जयपुर, राजस्थान में विश्व विख्यात परम संत बाबा जय गुरुदेव जी महाराज के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी संत श्री उमा कांत जी महाराज ने देश - दुनिया को वर्तमान एवं आसन्न संकटो से उबारने के लिए सरल उपाय बताते हुए कहा है कि संत महात्माओं की भूमि भारत में आध्यात्मिकता का लोप होता जा रहा है। अपराध, भ्रस्टाचार, अपहरण, बलात्कार, बढ़ता जा रहा है। प्रकृति, देवी-देवता नाराज हो रहे है। जिससे अमन चैन नहीं रहा है। संत उमाकांत जी महाराज ने बताया कि इन तकलीफो की जड़ मांस और शराब है। उन्होंने कहा कि ८४ लाख योनियों में मनुष्य शरीर से पहले गाय और बैल की योनि है। इसके बाद फिर यह देव दुर्लभ शरीर मिलता है। जिससे साधना करके नरक, चौरासी, जनम-मरण से छुटकारा मिलता है। दू:ख के संसार में फिर नहीं आना होता है। ऐसी गाय माता को लोग मार कर खा जाते है। सोचो, जिसका दूध पीते, माता कहते उसी का मांस खाते है। कुदरत सजा दे देगी। गाय को राष्ट्रीय पशु बना देने व गौ माता को मारने पर फांसी की सजा हो, ऐसा विधान बना देने से गौ माता की जान बच जाएगी। महाराज जी ने कहा कि इस काम को प्रधान मंत्री व मुख्य मंत्री ही कर सकते है। ईश्वरीय शक्ति ने ही इनको इस उच्च पद पर पहुचाया है, कुछ करने लायक बनाया है। अगर यह काम कर दे और जनता को न्याय व सुरक्षा दे तो मैं उस मालिक से रोजी रोटी सबको दिला दूँगा और भजन- पूजन-साधना के द्वारा आध्यात्मिक शक्ति दिला करके भारत को विश्व गुरु बना कर दिखा दूंगा। देश की करोडो जनता की भावनाओं की क़द्र करते हुए आप से प्रार्थना है कि आप गौ माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करके ऐसा विधान बना दें कि गौ हत्या करने वाले को फांसी की सजा हो जाये। आप की बड़ी मेहरबानी होगी। मैं संत उमाकांत जी महाराज ( बाबा जयगुरुदेव आश्रम, उज्जैन ) की गौरक्षा संबधी उपर्युक्त अपील (प्रस्ताव) से पूर्ण सहमत हूँ । मैं इसका समर्थन करते हुए प्रार्थना करता हूँ कि गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने का कानून बनाया जाये और गौ हत्या करने वालो को फांसी की सजा दी जाये। आप की अत्ति कृपा होगी। भवदीय बाबा जयगुरुदेव संगत, जिला __गाज़ियाबाद_ राज्य _उत्तर प्रदेश_ सम्बद्ध : बाबा जयगुरुदेव धरम विकास संस्था, उज्जैन फोन ०७३४-२५०७२३०, २५०७२५०

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के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

जागरण जंक्शन में मेरे ब्लॉग में मेरे विचार कुछ इस प्रकार हैं. कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के कारण आज़ादी के समय लेकर आज तक के बीच का कुछ समय छोड़ दें तो सारे समय कांग्रेस ही इस देश पर शासन करती रही है. मई 2014 के 16वीं लोक सभा के चुनाव में कांग्रेस को अप्रत्यासित हार का सामना करना पड़ा है. चुनाव परिणामों नें सभी को अचंभित किया है. हार भी ऐसी कि जिसकी कल्पना न तो कभी कांग्रेस नें की थी, और जीत ऐसी जिसकी कल्पना न तो तो भाजपा नें की थी. 543 सदस्यों के सदन में कांग्रेस को कुल 44 सीटों पर विजय मिली। यह संख्या रेकग्नाइज़्ड विपक्ष का स्थान पाने के लिए भी अपर्याप्त है. कांगेस नें कभी यह कल्पना भी नहीं की होगी कि ऐसे बुरे दिन भी कभी देखने पड़ेँगे. भारत के चुनाव के इतिहास में कांग्रेस का यह सबसे निम्नतम स्कोर है. . पिछले तीस सालों में में पहली बार किसी एक दल को अपने बल पर लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला है. वह दल है भाजपा. भाजपा नें अपने बल पर लोक सभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया है. किसी को भी यह अपेक्षा नहीं थी कि कांग्रेस के विरोध में और भाजपा के पक्ष में इतना तेज तूफ़ान चल रहा है. चूंकि बहुत सी बातें पहली बार हो रही हैं, इस कारण चुनाव परिणामों को समझने की स्वाभाविक उत्कंठा होती है, विभिन्न दलों से पतिबद्ध और मीडिया के लोग अपने अपने तरीकों चुनाव परिणामों का विश्लेषण करेंगे. मैं अपनी समझ के अनुसार चुनाव परिणामों को समझने कोशिश करता हूँ कांग्रेस की हार के अनेक करणों में हैं. सर्व प्रथम है दल का अहंकारी स्वभाव. सल्तनत का अहंकारी स्वभाव तो सबको पता है. नेहरू जी से लेकर इंदिरा जी और राजीव गांधी तक इस परिवार का व्यवहार सामंतवादी रहा है. आज़ादी के आस पास के समय और उसके थोड़ा बाद तक उस समय की पीढ़ी की लॉयल्टी / स्वामिभक्ति इस परिवॉर के साथ रही है.वह सल्तनत के हर प्रका के घमंड नाज नखड़े को बर्दाश्त करती रही है. आजकल की वर्तमान पीढ़ी सामंतवाद में विश्वास नहीं करती है और हर चीज़ को गुण दोष के आधार पर परखना चाहती है. वह अंध भक्ति में विश्वास नहीं करती है.. हमारी पुरानी पीढ़ी हर तरह के नाज, नखड़े, अहम और घमंड को बर्दाश्त करती रही है. सामंतवाद कांग्रेस की नस नस में रच बस गया है. लेकिन वर्तमान पीढ़ी इसके लिए तैयार नहीं है. चूंकि अहंकार पार्टी का चरित्र बन चूका है इस कारण पार्टी के सभी कार्यकर्ता किसी न किसी हद तक इससे प्रभावित रहे हैं. चुनाव के समय टी वी चैनलों पर आने वाले कांग्रेस के प्रवक्ताओं के अहंकार की कोई सीमा नहीं थी सर्व श्री कपिल सिबल मनीष तिवारी, सत्यव्रत चतुर्वेदी, अभिषेक मनु सिंघवी, अपना अहंकार प्रदर्शित करने मेंं एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ में शामिल थे. मोदी को गाली देने का जिम्मा बेनी प्रसाद वर्मा नें संभाला हुआ था. सलमान खुर्शीद भी उनसे पीछे नहीं थे मोदी द्वारा एक बार बेटी कह दिए जाने पर प्रियंका नें आसमान सर पर उठा लिया. वोट बैंक की खोज में आतंकवादियों का पक्ष लेकर दिग्विजय सिंह नें हिन्दुओं को इतना आहत किया कि हिन्दू वोट भाजपा की झोली में जाकर गिरा। जाहिर है कि अगर कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक बनाती है तो हिन्दू को भी संगठित होना पड़ेगा. यह स्वाभाविक है,. प्रियंका नें मोदी को नीच कह कर विमर्श का स्तर पाताल तक पहुंचा दिया. ऐसे घमंडी लोग जनता का समर्थन माँगते समय शर्म भी महसूस नहीं करते थे अपने अहंकार और घमंड का परिचय देने में हर कांग्रेसी ने अपना भरपूर योगदान दिया। भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा. अन्ना हज़ारे के जन लोकपाल और बाबा रामदेव के आंदोलन के समय कांग्रेस का व्यवहार अहंकार की पराकाष्ठा पर था. 2G, CWG, आदर्श सोसाइटी, कॉल ब्लाक आंवटन से सम्बंधित भ्रष्टाचार की खबरों से जब जनता का गुस्से से उबल रही थी ऐसे समय थे, हमारे प्रधान मंत्री किन्हीं अज्ञात कारणों से मौन धारण किये हुए थे. यह समझ के बाहर की बात है कि जब देश लुट रहा था उनके सामने निष्क्रिय होने की क्या मजबूरी थी अक्षम नेतृत्व बाकी कोर कसर राहुल नें पूरी कर दी. एक कागज़ पर लिखी हुई बेसिरपैर वाली बातें पढ़कर, कुर्ते की बाहें चढ़ाकर बार बार गुस्से का इज़हार करके उन्होंने ऐसा प्रभाव पैदा किया कि मानो उनके पास कहने को सकारात्मक कुछ भी नहीं है. उपरोक्त . सभी बातों का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस का नाम कीचड में मिल गया. परिणाम तो वही हुआ जो होना था. .

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

, प्रिय हाय यह तुम बैठक खुशी है, मैं एन बेन हूँ, मैं अमेरिका के संयुक्त राज्य से, एक संयुक्त राज्य सेना अधिकारी हूँ सहायक और देखभाल कर रहा हूँ, एक अच्छा दोस्त पाने के लिए इंतजार कर रही है, मेरी निजी ईमेल बॉक्स के माध्यम से हमारी बातचीत जारी है कृपया, यहाँ मेरा ईमेल पता (annben1@hotmail.com) मैं अपने आप को बेहतर शुरू करने और मैं आपके मेल प्राप्त होते ही मेरी तस्वीर भेज देंगे. , मैं आप के साथ संपर्क में आते हैं और मैं वास्तव में कारण मेरा कर्तव्य तुम्हारा की हालत को मेल लिखने के लिए मैं हमेशा उपलब्ध नहीं हूँ, हालांकि मेरी रुचि इंगित करने के लिए इच्छा एन. Hi dear, It is my pleasure meeting you, I am Ann Ben, I am a United State Army officer, from united state of America, am supportive and caring, looking forward to get a nice friend,Please let continue our conversation through my private email box, Here is my email address ( annben1@hotmail.com ) I will introduce myself better and send you my picture as soon as i receive your mail. I come in contact with you and I really wish to indicate my interest although i'm not always available to write mail due to the condition of my duty Yours, Ann.

के द्वारा: ann0000 ann0000

प्रिय श्री अग्रवाल जी, सादर नमस्कार। एक निष्पक्ष एवं अत्यंत संतुलिय लेख के लिए मेरी ओर से बधाई स्वीकार करें। मोदी पिछले लगभग १० वर्ष से ऊपर से सक्रिय हैं. लोगों नें उनको देखा है और उनके कार्य को सराहा है. उनके ऊपर तीसरी बार विश्वास प्रकट किया है. अगर निष्पक्ष एवं सकारात्मक दृष्टिकोण से विचार किया जय तो मोदी का कार्य तुलनात्क रूप से देश के अन्य राज्यों तो क्या केंद्रीय सरकार के मुकाबले भी श्रेष्ठ नज़र आता है. वाराणसी तो क्या वर्त्तमान परस्थितियों में देश के प्रधानमंत्री के तौर पर भी मोदी सबसे योग्य व्यक्ति नज़र आते हैं. मोदी नें अपने को prove किया है. केजरीवाल अभी हाल में लोगों को आकृष्ट किया है जब उन्होंने अन्ना हज़ारे के जनलोकपाल आंदोलन का श्री गणेश किया। उस समय उनका मुख्य मुद्दा था भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष। उस समय भी कुछ लोगों को आभास था कि केजरीवाल का उद्देश्य था राजनीती में कूदना और अपनी महत्तवाकांक्षा को संतुष्ट करना। अन्ना को धोखा देकर,ना ना करते हुए भी अन्ना की इच्छा के विरुद्ध जाकर भी केजरीवाल नें एक राजनितिक दल की स्थापना कर दिया। तुरंत उन्होंने पलटी मारी। अब उनका मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार मिटाना न होकर साम्प्रदायिकता से संघर्ष करना होगया है. यह चिरपरिचित वोट बैंक की राजनीती है,जिसका सभी तथाकथित सेक्युलर पार्टियां अनुसरण करती हैँ. केजरीवाल की राजनितिक महत्तवाकांक्षा अब स्पष्ट नज़र आने लगी है. वे कांग्रेस जैसे नज़र आने लगे हैं. उनका त्वरित कांग्रेसीकरण हो चूका है. केजरीवाल की विश्वसनीयता रसातल में पहुँच चुकी है. आश्चर्य होगा कि उनमें लोग विश्वास प्रकट करेंगे।

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

प्रिय श्री अग्रवाल जी, सादर नमस्कार। एक निष्पक्ष एवं अत्यंत संतुलिय लेख के लिए मेरी ओर से बधाई स्वीकार करें। मोदी पिछले लगभग १० वर्ष से ऊपर से सक्रिय हैं. लोगों नें उनको देखा है और उनके कार्य को सराहा है. उनके ऊपर तीसरी बार विश्वास प्रकट किया है. अगर निष्पक्ष एवं सकारात्मक दृष्टिकोण से विचार किया जय तो मोदी का कार्य तुलनात्क रूप से देश के अन्य राज्यों तो क्या केंद्रीय सरकार के मुकाबले भी श्रेष्ठ नज़र आता है. वाराणसी तो क्या वर्त्तमान परस्थितियों में देश के प्रधानमंत्री के तौर पर भी मोदी सबसे योग्य व्यक्ति नज़र आते हैं. मोदी नें अपने को prove किया है. केजरीवाल नें अभी हाल में लोगों को आकृष्ट किया है जब उन्होंने अन्ना हज़ारे के जनलोकपाल आंदोलन का श्री गणेश किया। उस समय उनका मुख्य मुद्दा था भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष। उस समय भी कुछ लोगों को आभास था कि केजरीवाल का उद्देश्य था राजनीती में कूदना और अपनी महत्तवाकांक्षा को संतुष्ट करना। अन्ना को धोखा देकर,ना ना करते हुए भी अन्ना की इच्छा के विरुद्ध जाकर भी केजरीवाल नें एक राजनितिक दल की स्थापना कर दिया। तुरंत उन्होंने पलटी मारी। अब उनका मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार मिटाना न होकर साम्प्रदायिकता से संघर्ष करना होगया है. यह चिरपरिचित वोट बैंक की राजनीती है,जिसका सभी तथाकथित सेक्युलर पार्टियां अनुसरण करती हैँ. केजरीवाल की राजनितिक महत्तवाकांक्षा अब स्पष्ट नज़र आने लगी है. वे कांग्रेस जैसे नज़र आने लगे हैं. उनका त्वरित कांग्रेसीकरण हो चूका है. केजरीवाल की विश्वसनीयता रसातल में पहुँच चुकी है. आश्चर्य होगा अगर उनमें लोग विश्वास प्रकट करेंगे।

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

आदरणीय सत्यशील अग्रवाल जी,सुप्रभात ! बहुत निष्पक्ष और बेहतरीन लेख आपने लिखा है.काशी में केजरीवाल जी अपनी जमानत भी नहीं बचा पाएंगे और अपने पार्टी की छवि भी ख़राब करेंगे.आपने बहुत सही कहा है-निष्कर्ष यही निकलता है की यदि अरविन्द केजरीवाल वाराणसी से चुनाव लड़ने का फैसला लेते है तो यह उनके लिए, उनकी वर्तमान छवि के लिए,और देश के भविष्य के लिए उचित नहीं होगा.क्योंकि जनता को उनसे बहुत सारी आशाएं है.अतः उनके लिए प्रत्येक कदम को बहुत सोच समझा कर उठाना चाहिए,जल्दी बाजी,या भावावेश में उठाया कदम उनके लिए,और उनकी पार्टी के लिए घातक हो सकता है,और देश के भविष्य के लिए भी उचित नहीं होगा.इस लेख के लिए आपको बहुत बहुत बधाई.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में अंग्रेजी भाषा का अपना महत्त्व बढ़ गया है,वैश्विक स्तर पर किसी अन्य देश के व्यक्ति से संपर्क करने के लिए (व्यापार करते समय,विदेशों में कोई जॉब करते समय )वार्तालाप का माध्यम अंग्रेजी भाषा ही होती है जिसे लगभग सभी देश के पढ़े लिखे व्यक्ति समझते हैं बोलते हैं।अतः सिर्फ धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने वाला युवक बिना किस अन्य योग्यता के भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में जॉब पा लेता है,और अच्छी खासी जिंदगी जीने योग्य हो जाता है।अतः वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में अपने विकास के लिए अंग्रेजी को अपनाना अत्यंत आवश्यक हो गया है, इससे ही हमारी अपनी और देश की उन्नति निर्भर है।हिंदी भाषा को अपनाते हुए उसे पूर्ण सम्मान देता हुए, अंग्रेजी पर अपनी पकड़ बनाना कोई अपनी संस्कृति का अपमान नहीं है और न ही देश के सम्मान के साथ कोई खिलवाड़ ! अंग्रेजी के महत्व को नकार नहीं जा सकता है आज के युग में ! इसलिए अपनी मातृभाषा को बचाकर रखना और उसको बढ़ावा देना और भी ज्यादा जरुरी हो जाता है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

प्रिय श्री अग्रवाल जी, सादर नमस्कार. मेरे और आपके विकारों में काफी साम्य है. मैं आपसे पूरी तरह सहमति व्यक्त करता हूँ. मेरे विचार में देश में कुछ समय के लिए गठबंधन सरकारों की आवश्यकता है. मेरे हिसाब से कारण कई हैं. एक है कि एक पार्टी की सरकार होने से तानाशाही का माहौल उत्पन्न होता है जैसा की इमरजेंसी में हुआ था. एक दलीय सरकार होने से कुछ ही राज्यों का विकास हो पाता है जो शासक दल को संमर्थन देते हैं. शासक दल द्वारा सभी राज्यों पर बराबर से ध्यान न दिए जाने से देश का सम्यक विकास नहीं हो पाता है. कुछ राज्य आगे निकल जाते हैं और कुछ पीछे रह जाते हैं. सभी राज्यों का सम्यक प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता है. इससे विसंगतियां पैदा होती हैं. गठंधन सरकार में सभी घटक एक दूसरे पर निगाह रखते हैं. राज्यों के साथ पक्षपात की सम्भावनाएं कम हो जाती हैं. सभी का सम्यक प्रतिनिधित्व होता है. हमने अपने यहाँ स्वयं देखा है की जब तक एक दलीय व्यवस्था रही कुछ राज्य बहुत पिछड़ गए. विभिन्न राज्यों में विभिन्न दलों की सरकारें बनने के बाद ही सभी राज्यों छतीसगढ़ , मध्य प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, झारखंड, बिहार इत्यादि का विकास शुरू हुआ यह कहना गलत होगा क़ि गठबंधन सरकारें अच्छी नहीं होतीं. मेरी समझ में वाजपेयी जी के नेतृतव में 23 दलों की गठबंधन सरकार अब तक की एक दलीय सरकारों के मुकाबले में सबसे अच्छी सरकार थी.

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अगरवाल जी,नमस्कार अच्छा लगा आपका तार्किक विवरण ईश्वर के विषय में ,मैं आपके इस मत से सहमत हूँ के ये धर्म कि आढ़ में ईश्वर के नाम का दुरूपयोग किया जाता है परन्तु कही ऐसा तो नहीं ये हमारे पूर्वजो कि चाल थी या उनके सद्मार्ग दिखने का तरीका था जिस से सब लोग डरें और कोई गलत काम न करे!पर एक सुप्रीम पॉवर का नाम बदनाम हो गया ,ये सुप्रीम पॉवर सबकी आंतरिक शक्ति या ओरा,यश तरंगे है जो ईश्वर के रूप में आप में और मुझ में सब में विधमान हैं !आप इसे जिस दिशा में लगाएंगे उसी तरह हो जायेंगे ,आपका परिवार,मोहल्ला समाज ,व्यव्हार ,जो आचरण सिखाता हैं ईशवर (आप ) वैसा ही करता है !ईश्वर तो आप में और हम में है उदहारण के तोर पर पुराने ज़माने में इतने बलात्कार, छेड़-छाड़ व् अपराध नहीं होते थे कारन मीडिया कि अश्लील पिक्चर नहीं थी,जल्दी विवाह होते थे,सामाजिक आधार पर नज़रो कि शर्म होती थी ,जब वो ईश्वर आप के भीतर था .अब एक शैतानी ईश्वर है,यदि ईश्वर को पाना है जिसकी कल्पना चित्र हमारे पूर्वज हमे दिखा कर गए है तो हमे उस पुराने अंदर के ईश्वर को जगाना पड़ेगा और आप पाएंगे एक नहीं सैंकड़ो अवतार ,धन्यवाद,यदि कुछ गलत लिखा हो मार्ग दर्शन जरूर करे व् अनुज समझ कर क्षमा करें

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 3 अगस्त 08 हाल ही में हिमाचल प्रदेश के विलासपुर जिले में नैना देवी मन्दिर की सीढ़ियों पर मौत का खेल देखा गया जिसमें 1150 व्यक्ति काल कलवित हो गये और अन्य सैकड़ों व्यक्ति घायल हो गये।  सन् 1854 प्रयाग में कुंभ मेले के दौरान मची भगदड़ में लगभग 800 श्रद्धालुओं की मौत हो गयी।  सन् 1983 नयना देवी-हिमाचल प्रदेश मन्दिर में भगदड़ से करीब 55 भक्तों की जीवन लीला समाप्त हो गयी।  सन् 1884 हरिद्वार के एक मंदिर में दर्शन के दौरान भगदड़ में 200 श्रद्धालुओं के जीवन का अन्त हो गया।  सन् 1989 हरिद्वार के कुंभ मेले के दौरान भगदड़ ने 350 तीर्थयात्रियों की जान ले ली। सन् 2005 महाराष्ट्र के सतारा जिले में मंदरा देवी मंदिर पर धार्मिक मेले के समय शार्ट सर्किट के चलते भगदड़ में 300 से ज्यादा भक्त मौत का शिकार हुए और 200 से ज्यादा घायल हो गये।  15,16 जून 2013 को उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में स्थित केदारनाथ मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों में हुई जल प्रलय की विपदा सभी के जहन में याद ताजा है,जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु काल के गाल में समां गए और लाखों लोग इस विपदा से प्रभावित हुए. मन्दिर के अन्दर ही लाशों के ढेर लग गए थे,और मंदिर परिसर में मलबे का अम्बार लग गया था बदइंतजामी के साथ साथ कुछ हमरै यानि श्रद्धालुओं की भी गलती तो रहती ही है ऐसे हादसों में !

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आदरणीय सर जी आपका यह आलेख बहुत ही सुंदरता से विश्लेषित है.एक बात धर्म की यह है कि सामाजिक जीवन में इनका प्रवेश धीरे-धीरे हुआ.आदिम मानव जब चीज़ों को नहीं समझता था तो उसे शक्ति मान पूजा करता था ,जब थोड़ी सभ्यता आई तो एक अदृश्य रहस्य रूपी शक्ति के प्रति कृतज्ञ हो हैम प्रार्थना करने लगे...जब और भी सभ्य हुए तो हमारे पास रोटी,कपड़ा,मकान के आलावा सामाजिक मिलाना जुलना ज़रूरी हो गया ...भक्ति भजन यज्ञ पूजा पाठ नैतिकता,आध्यात्मिकता के साथ सामाजिक सम्बन्धों को निभाने का भी माध्यम हैं .बस इन्हे अनर्गल कर्मकांड से ना जोड़ा जाए.पूजा प्रार्थना एक आध्यात्मिक सोच है जो रहस्य रूपी असीम शक्ति के प्रति गहराई से कृतज्ञता है कि प्रभु हैम धन्य हैं आपने हमें एक्स्तित्व के रूप में भेजा है ....शेष तो सब गहरा रहस्य है.

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हर हाल में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनना ही महिलाओं को मान सम्मान दिला सकता है और महिलाओं को सम्मान भी तभी मिलेगा जब उसको अपने घर - परिवार में सम्मान मिलेगा, समाज में सम्मान तभी मिलेगा जब बेटी का जन्म लेना अभिशाप न कहला के वरदान कहा जाये क्यूंकि नारी को शक्ती कि उपाधि हमारे शास्त्रों ने दी है अतः पुरुष पति परमेश्वर है तो नारी जगदम्बा है अगर ऐसा भाव ऐसा ख्याल परिवार में आएगा तो समाज में भी आएगा क्यूंकि परिवार से ही समाज बना है और जरूर महिलाएं भी समाज में सर उठाकर जीने का अवसर प्राप्त करेंगी .सतयशील जी आपने बहुत महत्वपूर्ण विषय को उठाया है जो आज अपने देश में एक समस्या के रूप में ब्याप्त है श्रेस्ट ब्लॉग लिखने के लिए आपको बधाई

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दोनों नेताओं के व्यक्तितित्व का विश्लेषण करने से ज्ञात होता है की देश के अगले प्रधानमंत्री के वर्त्तमान परिस्थितियों के अनुसार नरेंद्र मोदी को ही प्रधामंत्री बनना चाहिए,और केजरीवाल को विपक्ष में बैठ कर महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए और प्रशासन का अनुभव लेना चाहिए. जनता भी स्थानीय मुद्दों और राष्ट्रिय मुद्दों को अलग अलग परिपेक्ष में देखती है.अतः राष्ट्रिय स्तर पर वह भा. ज. पा. को ही जीतते हुए देखना चाहेगी.यद्यपि आम आदमी पार्टी को लोकसभा में एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने का अवसर भी मिलेगा.देश की जनता को किसी भी पार्टी से एलर्जी नहीं है यदि वह जनता के हित में देश के विकास कार्य करे,और जनता को भ्रष्टाचार मुक्त,अपराध मुक्त सुशासन दे .यदि सदन में ‘आप’ पार्टी विद्यमान रहेगी और जागरूकता के साथ कार्य करेगी तो अवश्य ही देश को सुशासन मिल सकेगा.क्योंकि वह सरकार के प्रत्येक कार्य पर अपनी तीखी निगाह रखेगी और जनहित में कार्यों को अंजाम देने को मजबूर करेगी. अभी वक्त लगेगा अरविन्द को उस स्तर तक आने में लेकिन भरोसा करना पड़ेगा कि ये चलता रहे और अरविन्द भी इस स्तर तक पहुंचे !

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क्या आतंकवादी यह निश्चित रूप से कह सकते हैं कि उनके आत्मघाती हमले में सिर्फ गैर इस्लामी व्यक्ति निशाना बनते हैं। उनके हमले में क्या मुसलमान नहीं मारे जाते। दरअसल यह तो आतंकवादी बनाने के लिए उनकी बुद्धि को कुण्ठित करने के लिए इस्लाम का सहारा लेकर मोहरा बनाने की साजिश है। वे सिर्फ अपना भला चाहते हैं, अपना आधिपत्य बढ़ाना चाहते हैं, उन्हें किसी धर्म, देश, व्यक्ति से कोई लगाव नहीं है। वे हिंसा का सहारा लेकर सत्ता के गलियारे तक पहुंचना चाहते हैं। वे इस्लामी कट्टरता, बदले की भावना, गरीबी व अन्य मजबूरियों का फायदा उठाकर आतंकवादी तैयार कर लेते हैं और अपना स्वार्थ सिद्ध करने में कामयाब हो रहे हैं। एक आम मुसलमान, अमनप्रिय मुसलमान, शिक्षित मुसलमान, इनके काले कारनामों के कारण संदेह के अंधेरे में जीने को मजबूर है। पूरे इस्लाम समुदाय को विश्व में अविश्वास के साथ रहना पड़ रहा है। वह अपना दर्द किसी को बता भी नहीं पा रहा है। धर्म की आड़ में मौत का घिनौना खेल खेलने वाले न तो स्वयं शांति से जीना चाहते हैं और न ही अन्य किसी को जीने देते हैं। यद्यपि यह भी सत्य है हिंसा में लिप्त व्यक्ति किसी धर्म का और मानवता का हितैषी नहीं हो सकता। वह सिर्फ इंसानियत का दुश्मन है वह सिर्फ हैवान है।लेकिन पैरवी करने वाले लोग तो ये बात कभी स्वीकार ही नहीं करते श्री सत्यशील अगरवाल जी ? हमेशा कि तरह बेहतरीन और प्रभावी लेखन !

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दिल्ली के चुनावो में यदि आप को विजई मिलती हे तो देश कि राजनीती में एक नए युग का सूत्रपात हो जायेगा,बीजेपी से उम्मीद थी कि वह राजनीती को शुद्ध करने का कम करेगी परन्तु वे कोंग्रेश से भी एक कदम आगे निकले,जिस karyakarta का वे दम भरते थे सबसे पहले उसीकी उपेक्षा इन्होने की.दूसरी पार्टी के भ्रस्ट तत्वो के लिए इनके दरवाजे हमेशा खुले रहे,दीनदयाल जी कि साडी नैतिकता इन्होने कोने में उठा कर रख दी,और गडकरी कि सत्ता लोलुपता पार्टी पर हावी हो गयी,१९९८ में जनता ने इन्हे बड़े विश्वास से गद्दी दी थी परन्तु जब यहाँ गोविंदाचर्या के स्थान पर प्रमोद महाजन कि सात सितारा संस्कृति बीजेपी का मूल हो गयी तो जनता ने भी इनसे मुह मोड़ लिया, इस बार आम आदमी पार्टी ने जनता के सामने खांटी राजनीतिज्ञो के स्थान पर आम लोगो को मैदान में उतरा हे और यदि यह प्रयो सफल होता हे तो भारतीय राजनीती कि दशा और डिश बदलना निश्चित हे.

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परन्तु जो अल्पसंख्यक के हितों की बातें करे वह धर्म निरपेक्षता का पक्षकार माना जाता है.एक केन्द्रीय मंत्री मुस्लिमों को आतंकवाद के गलत आरोपों में न फंसाने के लिए मुख्य मंत्रियों को पत्र लिखते है,क्या अन्य लोगों को गलत आरोपों में फंसाना न्याय संगत है? केंद्र सरकार द्वारा एक जाँच एजेंसी को मुस्लिमों की गरीबी का आंकलन करने का काम सौंपा जाता है,क्या अन्य समुदाय के लोग गरीब नहीं हैं?कोई नेता मुसलमानों में २०%आरक्षण देने की बात करता है तो कोई देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक़ बताता है , इत्यादि। इस प्रकार देश के बहु संख्यक समुदाय की घोर उपेक्षा की जा रही है और धर्मनिरपेक्षतावाद को मुस्लिम समर्थन का रूप दे दिया गया है जब जब चुनाव का बिगुल बजने लगता है , एक ढोल और साथ ही साथ बजता है रह रह के ! मीठी गोली देने वाला ढोल ! कभी किसी को आरक्षण , कभी लैपटॉप देने की मीठी गोली ! चुनाव है , देखते रहिये !

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आज भी हम अंग्रेजी को पढने और समझने को क्यों मजबूर हैं, इसका भी एक कारण है ,उसे एक उदहारण से समझा जा सकता है,मान लीजिये हम किसी बड़े कारोबारी,व्यापारी या दूकानदार से व्यव्हार करते है(जिसे हम एक विकसित देश की भांति मान सकते हैं)तो हम उसकी समस्त शर्तों को सहर्ष स्वीकार कर लेते है,जैसे उसके द्वारा लगाये गए समस्त सरकारी टेक्स,अतिरक्त चार्ज के तौर पर जोड़े गए पैकिंग,हैंडलिंग डिलीवरी चार्ज को स्वीकार कर लेते हैं,यहाँ तक की जब किसी बड़े रेस्टोरेंट का मालिक, ग्राहक को अपना सामान देने से पूर्व कीमत देकर टोकन लेने के लिए आग्रह करता है, तो हम टोकन लेने के लिए पंक्ति में लग जाते है,मेरे कहने का तात्पर्य है की हम उसकी समस्त शर्तो को मान लेते है,उसकी शर्तों पर ही उससे लेनदेन करते है,परन्तु जब हम किस छोटे कारोबारी या दुकानदार( अल्प विकसित या विकास शील देश की भांति) के पास जाते है तो वहां पर उसे हमारी सारी शर्ते माननी पड़ती हैं,अर्थात वह हमारी सुविधा के अनुसार व्यापार करने को मजबूर होता है.वहां पर हमारी शर्तें प्राथमिक हो जाती हैं.उदाहरणों सहित बेहतरीन पोस्ट लिखी है आपने श्री सत्यशील जी !

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अगरवाल जी नमस्कार, आपके विचारो से सहमत हूँ ,हिंदी हमरी राष्ट्र भाषा होने के साथ साथ संपर्क भाषा भी होनी चाहिए,जिस प्रकार यदि हिंदी सिनेमा को देखे तो स्थानीय भाषाओ के सिनेमा होने के उपरांत भी अधिक लोकप्रिय हैं कारन इस भाषा को सरलता से समझा जा सकता है डॉक्टर एस शंकर सिंह जी ने ठीक ही लिखा है जब आपसी बात होती है तो प्रांतीय भाषा में बात करते हैं परन्तु दुसरे लोगो से बात करने के लिए हिंदी माध्यम में ही बात सामान्यता होती है उद्हारण के लिए किसी ट्रेन या बस में यात्रा करते समय अपनी बात गुप्त रखने के लिए पारिवारिक लोग अपनी स्थानीय भाषा चुनते है पर जब परिवार से अलग किसी अन्य से बात करते हैं तो अधिकतम हिंदी का ही प्रयोग करते हैं .अंग्रेजी का उपयोग गलत नहीं हैं किसी भाषा का ज्ञान होना अच्छी बात है! पर हिंदी याने मात्र भाषा का अनादर तो गलत हैं इस मात्र भाषा को राष्ट्र भाषा ,संपर्क भाषा बनाने की आवश्यकता हैं ताकि देश एक शाशाक्त राष्ट्र के रूप में उभरे ,हमारे सामने चीन का उदहारण हैं केवल चईनीसी भाषा का उपयोग पुरे देश में होता है,उसी प्रकार जापान में जप्नीसे का ,तो हिन्दुस्तान में हिंदी क्यों नहीं ? किर्पया हिंदी का उपयोग बढ़ाये ताकि एक राज्य के लोग दुसरे राज्य के लोगो के विचार आदान प्रदान कर सके और अनेकता में एकता की मिसाल बन सके ये देश !

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बहुत वर्ष पहले दक्षिण के राज्यों में हिंदी का विरोध था. आज तमिलनाडु को छोड़ दें तो अन्य दक्षिणी राज्यों में हिंदी का विरोध लगभग समाप्त होने को है. तमिलनाडु लो छोड़कर आज सभी राज्यों में हिंदी समझी या बोली जाती है. तमिलनाडु में राजनीती हिंदी के इर्द गिर्द ही घूमती है. और सभी राज्यों में हिंदी की स्वीकार्यता निश्चित रूप से बढ़ी है. देश में लगभग 41 % लोग हिंदी समझते और बोलते हैं. अन्य कोई भाषा 10 % से ज्यादा लोगों द्वारा नहीं बोली जाती है. इस प्रकार हिंदी ही बचाती है जो सभी को एकसूत्र में बाँध सके. इंग्लिश केवल 9 % लोगों द्वारा ही बोली जाती है आज हम पाते हैं की तमिल. तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, मराठी, उडिया, बंगाली, उडिया, पंजाबी बोलने वाले जब आपस में बात करते हैं तो हिंदी में ही बोलते हैं. हिंदी संपर्क भाषा का रूप लर चुकी है. हाँ, तकनिकी ज्ञान अर्जित करने के लिए और अंतर्राष्ट्रीय संपर्क के लिए हें इंग्लिश की भी आवश्यकता होगी.

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हमें हिंदी ब्लोगिंग को लोकप्रिय बनाने के लिए,अंग्रेजी की ब्लोगिंग से टक्कर लेने के लिए, ब्लॉग में उच्च गुणवत्ता को प्रोत्साहित करना होगा। हिंदी ब्लॉग के रचना कारों को तथ्य परक,गहन सूचना परक, उच्च गुणवत्ता वाले ब्लॉग तैयार करने के लिए प्रेरित करना होगा।यह तो निश्चित है यदि ब्लोगिंग में उच्च गुणवत्ता लानी है तो उसके लिए ब्लोगर को अतिरिक्त धन व्यय करना होगा,उन्हें अधिक श्रम अधिक समय और अधिक प्रयासों को अंजाम देना होगा।यदि ब्लोगर मात्र हॉबी(शौक या समय पास ) के लिए ब्लॉग लिखता है तो उसके लिए उस पर अतिरिक्त व्यय करना संभव नहीं होता।अतः जो ब्लोगर लोकप्रिय हैं,उच्च गुणवत्ता वाले ब्लॉग लिखने की क्षमता रखते हैं उन्हें उचित पारिश्रमिक की व्यवस्था होनी चाहिए।ब्लॉग साइट्स के संचालकों को अपनी कमाई के साथ साथ ब्लोगेर्स के हित में भी सोचना होगा।कम से कम ब्लॉग बनाने में उनके द्वारा किया गया खर्च तो मिलना ही चाहिए,ताकि कालांतर में वे ब्लोगिंग को व्यवसाय के रूप में अपना सकें,और हिंदी साहित्य को विश्वपटल पर उच्च स्तरीय साहित्य के रूप में प्रस्तुत कर सकें। बहुत सटीक एवं सार्थक लेखन दिया है आपने श्री सत्यशील अग्रवाल जी ! हिंदी ब्लोगिंग के पक्ष में खड़ा एक सार्थक लेख !

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यदि ब्लोगर मात्र हॉबी(शौक या समय पास ) के लिए ब्लॉग लिखता है तो उसके लिए उस पर अतिरिक्त व्यय करना संभव नहीं होता।अतः जो ब्लोगर लोकप्रिय हैं,उच्च गुणवत्ता वाले ब्लॉग लिखने की क्षमता रखते हैं उन्हें उचित पारिश्रमिक की व्यवस्था होनी चाहिए।ब्लॉग साइट्स के संचालकों को अपनी कमाई के साथ साथ ब्लोगेर्स के हित में भी सोचना होगा।कम से कम ब्लॉग बनाने में उनके द्वारा किया गया खर्च तो मिलना ही चाहिए,ताकि कालांतर में वे ब्लोगिंग को व्यवसाय के रूप में अपना सकें,और हिंदी साहित्य को विश्वपटल पर उच्च स्तरीय साहित्य के रूप में प्रस्तुत कर सकें। - बहुत ही उत्तम औरत श्रेष्ठ विचार अग्रवाल साहब. आपने इस प्रतियोगिता के आलेख में बहुत सारे ब्लोगर्स के मन की बात कह दी .. आपके एनी लेख की तरह यह आलेख भी गुणवत्ता के मानदंड को परिभाषित करता है .हार्दिक अभिन्दन!

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चन्द मुठ्ठी भर लोगों के विकसित हो जाने से देश को विकसित नहीं माना जा सकता देश को तभी विकसित माना जा सकता है जब देश के आखिरी ब्यक्ति तक भी विकास की पहुँच हो उसे भी अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए सरकार का मुह ना देखना पड़े और यही शब्द महात्मा गाँधी के भी थे पर इन नेताओं ने गाँधी जी तस्वीर तो हर सरकारी कार्यालय और पार्लियामेंट भवन में जगह जगह लगा दी है पर गाँधी जी का क्या सपना था ? क्या कहना था ?आजदी मिलने के बाद ये सभी नेता और अधिकारीगन भूल गए केवल २ परतिशत लोगों के अमीर बने रहने से सारा देश गरीब होता जा रहा है यह बहुत बड़ी विषमता है इसे समय रहते ख़तम होना चाहिए वर्ना बहुत बड़ी क्रांति अपने देश में आएगी आतंकवादी हमले और नक्सली हमले बढ़ेंगे . सत्यशील जी एक प्रेरणा दायक आलेख जिससे आज के युवा वर्ग और नेताओं को कुछ सीखना चाहिए

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सत्यशील जी निश्चीत तौर पर युवा ही इस देश के भविष्य हैं और सौभाग्य से आज १२ अगस्त भी है जिसको संसार युवा दिवस के रूप में मनाने जा रहा है मेरी हार्दीक शुभकामना युवाओं को और आपने सही सुझाया है जब तक युवाओं को उच्च स्तर की सिक्षा नहीं मिलेगी वे कैसे प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे और शिक्षण संस्थानों में उचित सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारन भी शिक्षा में ढेर सारी कमियाँ रह गयीं हैं केवल देश के बच्चों को साक्षर बना देने को ही शिक्षा नहीं कहते यह देश की सरकार चलने वालों को सोचना होगा और अपने देश में सुविधा और उच्च स्तर की पढाई नहीं होने के कारन अपने देश की प्रतिभा का पलायन भी द्रुत गति से हो रहा है जो देश के भविष्य के लिए किसी खतरे से कम नहीं एक अच्छा आलेख आपको बधाई

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अग्रवाल जी आपने अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस पर एक सार्थक और जन जागरण लेख लिखकर वास्तव में बधाई का काम किया है ! आपने बिलकुल ठीक कहा है की आज की तकनीक रोज एक नया रिकार्ड बनाकर युवा वर्ग को एक कड़ी चुनौती दे रहा है ! ये नयी नयी खोज करने वाले भी युवा ही हैं ! न की मुलायम-मायावती-लालू जमाने के लोग ! लेकिन हमारे भारत महान में इन युवाओं को जब रोज भ्रष्ट राजनेताओं के कुकर्मों के कुचक्रों से बाहर निकलने के लियें संघर्ष करना पड़ता है, बहुत सारी ऊर्जा इन फजूल की घटनाओं में गंवाना पड़ता है, जहां मुख्य मंत्री केवल अपने स्वार्थ सिद्धी के लिए ईमानदार अधिकारियों पर गाज गिरा दे, झूटे केशों में फसाकर रोज सरकार या उसके मंत्री एक बखेड़ा खडा कर दे, ऐसी मानसिकता रखने वाले राजनेताओं के देश में इन युवाओं का भविष्य क्या होगा, इस विषय पर चिंतन करने की जरूरत है ! शुभ कामनाओं के साथ हरेन्द्र जागते रहो !

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aadarniya सत्य शील जी आपकी तर्कसंगत सभी बातें उचित ही प्रतीत होती है किन्तु हमें इन सब बातों को देखते हुए इस बात को ध्यान में रखने की आवश्यकता है की भारत एक परम्पराओं का देश है जहां सभी पुरानी परम्पराए आज कुरीति समझी जाती है क्या इस देश में परम्परा के नाम पर विधवा महिला के साथ तो अमानवीय व्यवहार सत्ती प्रथा के नाम पर किया जाता था वह उचित था ? नहीं न इस लिए आज हमें इस आधुनिक युग में अपनी पुरानी परम्पारों को बदलने या समाप्त करने की जरूरत है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता, किन्तु आज जब प्रतिष्ठित लोग या सम्पान लोग अपने प्रियजन की तेहरवीं संपन्न करते है तो ऐसा लगता है जैसे यह कोई वेशेष समारोह हो रहा है कहीं भी ग़मगीन नजारा नहीं दीखता - वहीं तेहरवी की रसम इतनी बुरी भी नहीं है इसका एक सामाजिक पहलू भी है पुराने समय में आवागमन के साधन कम होने के कारण सगे सम्बन्धी या पारिवारिक जानो को किसी की मृत्यु होने पर समय पर नहीं पहुचने के कारन स्थानीय जाती से सम्बंधित लोगो पर निर्भर रहना पड़ता था और यह परम्परा लगभग सभी जातियों में की कही जब सब लोग किसी कार्यक्रम में आते है तो सामूहिक भोज भी दिया ही जाता है और शायद यही कारन है की तेहरवी पर भोजन देने की जरूरत है लेकिन इसमें भव्यता दिखाने की जरूरत नहीं है ? क्योंकि आप देखते है की अगर आपने मकान बनवाया है या आप अपने मकान में कुछ रंग रोगन करा रहे है तो आप काम करने वालों की दो टाइम की चाय तो अवश्य हे देते होंगे क्या यह भी उचित है लेकिन आज यह परम्परा सी बन गई है

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अक्सर देखा गया है धार्मिक स्थलों या धार्मिक आयोजनों में अप्रत्याशित भीड़ जुट जाती है जो संभावनाओं से कहीं अधिक हो जाती है और स्थानीय प्रशासन द्वारा किये गए सभी प्रबंध बौने साबित होते है अर्थात अपर्याप्त सिद्ध होते है। किसी भी दुर्घटना की स्थिति में शासन और प्रशासन की शिथिलता और संवेदनहीनता खुल कर सामने आती है, जो पीड़ितों की परेशानियों को और भी बढ़ा देती हैं।जो यह सिद्ध करती है की हमारी सरकारें जनता के जान माल के लिए कितनी फिक्रमंद हैं,शायद उनके कार्य शैली में आम व्यक्ति की जान की कोई कीमत नहीं है,हमारे राज नेता विप्पति में भी अपनी राजनीती से बाज नहीं आते।नौकरशाहों के लिए भी उनका जनता के दर्द से कोई सरोकार नहीं है उन्हें तो सिर्फ अपने आकाओं को खुश रखना ही उनकी नौकरी बचाए रखने के लिए काफी है बिल्क्लुल ! आपदा को नियंत्रण करने के लिए बहुत अच्छे सुझाव दिए हैं अग्रवाल साहब आपने, उपयोगी सुझावों से युक्त उत्तम आलेख !

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सत्शील जी परम्पराओं के नाम पर हमारे समाज में अनेकों बुराईयाँ हैं और यह मृत्यु भोज भी उनमें से एक है इसमें संदेह नहीं हर कोई मरनेवाला किसी परिवार का सदस्य होता है और उसको खोने का गम सबको होता है लेकिन हमारे शस्त्रों के हिसाब से मृत्यु को एक कटु सत्य कहा गया है और हर पैदा होनेवाला एक न एक दिन मरेगा और मरने के बाद किये जानेवाले सभी कर्मकांड शस्त्रों के हिसाब से दिवंगत आत्मा की शांति के लिए बनाया गया है और उसीको ध्यान में रखकर किया भी जाता है रही बात गरीबों द्वारा कर्ज लेकर मृत्यु भोज करने की ब्राह्मण भोजन करने की अगर वह गरीब यह मने बैठा है की पंडित जी हीं उसको इन धार्मिक कर्जों से मुक्ति दिलाएंगे तो जरुर ऐसा करता होगा वर्ना आज पंडितों को ज्यादा अमीर लोग याद करते हैं और और अपनी पाप की कमाई को कुछ दान पुन्य के काम में खर्च करके पाप कटाना चाहते हैं गरीब ऐसे में कर्ज लेकर ब्राह्मण भोजन कराता है तो यह उसकी मूर्खता है क्यूंकि वह गरीब पैदा हुवा यही उसका सबसे बड़ा पाप है वह यह नहीं समझता आज की तारिख में बहुत कम अनपढ़ गरीब इन बातों को मानने के लिए तैयार हैं आपने एक सही आलेख लिखा है और इससे लोगों को सीख मिल सकती है खासकर उनको जो मरणोपरांत जश्न मानते हैं

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अग्रवाल जी एक प्रेरणा दायक आलेख के लिए आपको बहुत बधाई आपने अपने इस आलेख में समस्यायों के साथ उनका समाधान भी सुझाया है और आपका यह सुझाव बहुत अच्छा लगा की जो लोग इस चार धाम यात्रा के लिए आते हैं वे एक बार ही जीवन में ऐसी जगहों पर आयें क्यूंकि इन यात्राओं में अब लोग भीड़ होने से भी मरने लगे हैं निस्संदेह यह एक प्राकृतिक विपदा थी पर जो लोग शासन प्रशासन चला रहे हैं उन्होंने इतनी बड़ी यात्रा के दौरान कौन सी सावधानियां बरती इतनी बड़ी यात्रा के लिए कौन से इन्तेजाम किये यह एक गंभीर प्रश्न है और जब आपदा प्रबंधन का समय आया तो लोग राजनीती भी करने लगे और कांग्रेस पार्टी तो समझने लगी की कहीं बीजेपी इसका श्रेय न ले ले अतः उन्होंने मोदी को जाने से ही मना कर दिया और राहुल जी जो १९ तारीख को जन्मदिन की पार्टी मना रहे थे और यह आपदा १६ साबीत होंगे अगर बन जाते हैं तो और भविष्य में यदि इस यात्रा को नियंत्रित करने का बंदोबस्त हो जाये जैसा की आपने सुझाया है तो जो लोग आज लापता हैं उनकी जानकारी उनके परिवार वालों को मिलने में आसानी होती . आशा है आपके इस सुझाव को केंद्र की सरकार एवं उत्तराखंड की सरकार उचित समझेगी और भविष्य में इसका ध्यान रखेगी

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अग्रवाल जी सबसे पहले मैं आपको इतनी जानकारी इकठ्ठा करने और उसे जागरण जंगशन के पाठकों में बांटने के लिए धन्यवाद करता हूँ ! आपने सही तथ्यों को उजागर किया है ! ये यात्रा हर साल होती है और इतने ही यात्री मई जून के महीनों में यहाँ आते हैं ! फिर, इस साल क्यों मृत्यु का तांडव नृत्य हुआ ? इसके पीछे सबसे बड़ा कारण स्वयं यात्री, अपने साथ खाने पीने के सामान को लेकर जाना बाकी बचे हुए को जगह जगह फेंक देना, पालीथिन की थैलियों को सडकों, जंगलों, नदी नालों यहाँ तक जिस देवता के दर्शन करने जा रहे हैं उसके सिर से पांवों तक इन गंदी वस्तुवों से उन्हें सजा देते हो ! दर्शन करने जा रहे हो बड़े ताम झाम के साथ ! हजारो, लाखों गाड़ियां रोज इन पहाडी सडकों पर दौड़ती हैं, पेट्रो की गैस प्रदूषण, और पहाड़ जो बार बार के बमों से कमजोर हो चुके हैं, उनके सिर के ऊपर के पेड़ झाड़ियाँ गायब हो चुकी हैं मिटी बह गयी और बारीश का पानी पहाड़ों की सिलाओं के भीतर जाकर उन्हें नीचे आने के लिए मजबूर कर देता है ! दर्शन करने कम मौज मस्ती ज्यादा ! फिर विकास कामों को हथियार बनाकर हर पुल, सड़क, डैम बानाने में मिलावट, ज्यादा से ज्यादा लाभ जिसको ठेकेदारों को, मंत्री, नौकरशाह, पुलिस कर्मी, इंजीनियार और उन सारे लोगों के साथ शियर करना पड़ता है जो इन विकास कार्यों में सलग्न हैं ! पाप करोगे तो भोगना पडेगा ! अब सवाल आता है केवल यात्री ही क्यों भुगते, प्रशासक प्रशासन क्यों नहीं ! तो भय्या ये तो कंस हैं, जब इनका पाप का पेट (घडा) पूरी तरह भर जाएगा तो उन्हें तो जीते जी अंग्नी का विसाल कुण्ड मिलेगा पापो के कलुषित कर्मों को भोगने के लिए !बहुत बहुत बधाई और साधुवाद !

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सत्यशील जी आपके नाम की तरह यह कथन भी सौ फीसदी सत्य है पर अफ़सोस की बात तो यह है की आज लोग हसना , खुश होना भूल से गए हैं क्यूंकि माया के जाल में फंसे हुए हैं वरना अपने शास्त्रों में तो बहुत पहले कहा गया है "सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः " जिसका अर्थ ही है सब लोग सुखी हो और सभी निरोग होवें पर आज आप भी देख रहे होंगे एक परिवार में अगर ४ भाई हैं तो चारो की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं होती पर क्या कोई ज्यादा पैसे कमाने वाला दुसरे किसी कमजोर भाई की मदद करता है? नहीं ना बस इसी से जान जाना चाहिए की सबकी ख़ुशी में लोग कितना खुश होना चाहते हैं बात आपने बहुत ही सही लिखा है लेकिन आज के गलत सोंच और स्वार्थी समाज में आपसी ब्यवहार में अछि बातें तो लोगों को अच्छी लगती भी नहीं और हजम भी नहीं होती लेकिन फिर भी मैं आपके प्रयास को सराहुँगा क्यूंकि har andhere के baad सवेरा होना ही है एक पुराना गाना yaad aa गया "vo सुबह कभी तो aayegi " धन्यवाद आपके is आलेख पर मेरे विचार आज जो kuchh हो रहा है us पर आधारित है

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अग्रवाल जी आपने "विश्व बाल श्रम" निरोधक विषय पर अपनी चिंता और साथ ही उसके निराकरण के लिए सुझाव दिए हैं इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं ! शासक प्रशासक इस विषय पर अपनी चिता जाहीर करते हैं बार बार, इसके लिए सरकारी खजाने से बड़ी बड़ी रकमें की खर्च की चुकी है लेकिन क्या इसका एक प्रतिशत भी निराकरण हो पाया है ? नहीं ! सरकार आदेश निकालती है और निकालते कौन हैं, मंत्री नौकरशाह लेकिन इनके घरों में इनकी निजी फैक्ट्रियों में जाकर देखो बाल मजदूर और बाल नौकर मिल जाएंगे ! ये एक तरीके से बंधुवा मजदूरों की श्रेणी में आते हैं ! इनके दादा पापा इनके घरों या फैक्ट्रियों में मजदूरी करते थे तो ये भी करते हैं ! शिक्षा मंत्री भाषण देते हैं गरीब बच्चों को स्कूल भेजने की सलाह देते हैं लेकिन स्वयं अपने घर और फैक्ट्री के ५ से १५ साल के बाल मजदूरों को, घर के नौकरों को स्कूल नहीं जाने देंते ! इसी तरह बड़े बड़े उद्योग पतियों, व्यापारियों, बड़े किसानों, ग्राम प्रधानो, दुकानदारों और पुलिस अधिकारियों के घरों में भी बहुत सारे गरीबी से संघर्ष करने वाले बच्चे मिल जाएंगे ! जब तक देश को दलालों और भ्रष्ट नेता शासक प्रशासकों और उनके चम्मचों से मुक्ति नहीं मिल जाती तब तक बाल श्रम निरोधक दिवस केवल समाचार पत्रों की सुर्ख़ियों का आकर्षण और सरकारी कागजों की खाना पूर्ती मात्र बन कर रहेगा ! लेकिन आप जैसे जागरूक लेखकों की लेखनी जनता को जागृत करेगी और आज नहीं तो कल इन मासूम निरीह गरीब बाल श्रमिकों की पुकार सूनी जाएगी ! हरेन्द्र

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सत्यशील जी , सादर नमस्कार मैंने आपका लेख '' क्यों होता .....'' पढ़ा । आपने काफी हद तक सही कहा है लेकिन एक बात मैं आपको और बताती हूँ आप शायद मानें या न माने इसमें सारा दोष सिर्फ युवा पीढ़ी का नहीं है आजकल कुछ बुजुर्ग ऐसे भी हैं जिन्हें अकेले रहने की आदत पड़ गयी है उन्हें अपनी आजादी में खलल पसंद नहीं । ऐसा नहीं कुछ युवा पीढ़ी में आज भी ऐसे युवा भी है जो बुजुर्गों के साथ रहना चाहते है पर बुजुर्गों को बच्चों का शोर , घर में बच्चों का सामान छूना , बेटे का टोकना पसंद नहीं होता । एक बात और मैं यहाँ पर बताना चाहूंगी कि कुछ ही लोग होते हैं जो अपना वक्त याद रखते हैं और वे युवा पीढ़ी को उसी तरह से ट्रीट करते हैं वही बुजुर्ग अपने बच्चों के साथ सुखी हैं । आपने बहुत ही अच्छे विषय का चुनाव किया है । अगर जागरण ब्लॉग के लेखक राजनीति के साथ साथ इस तरह के लेख लिखते रहेंगे तो सभी पाठकों के लिए अच्छा होगा । सत्य शील जी मेरा आपसे निवेदन है कि आप मेरा लेख '' जीवन चलने का नाम '' अवश्य पढ़ें और हाँ आपने एक कविता भी लिखी थी '' त्याग का गुणगान'' गजब की कविता है पता नहीं आपको मेरा कमेंट मिला या नहीं । उसे पढकर मुझे मेरे स्वर्गीय पिता द्वारा किये गये त्याग की याद आ गयी । सर्वोत्तम

के द्वारा: Manisha Singh Raghav Manisha Singh Raghav

सत्शील जी आपके आलेख से मैं पूर्णतया सहमत हूँ चुकी हम और आप दोनों ही उम्र के उस पड़ाव से गुजर रहें हैं और हमारे रोजमर्रा की दिनचर्या में वो सब बातें दीखती हैं जिसका आपने जिक्र किया है इसमें संदेह नहीं की बुजुर्ग होने के बाद आदमी एक तरह से खाली हो जाता है उसके पास करने को कुछ रह नहीं जाता तो वह हमेशा युवा लोगों से अपेक्षाएं रखता है युवाओं की आलोचना करता है उसकी देख भाल ठीक से नहीं हो रही है केवल इसका ही ख्याल उसको आता है लेकिन वास्तव में आज का युवा प्रतिस्पर्धा में इस तरह लगा हुवा है की उसको हर वक्त ब्यस्तता ही रहती है और यह सच्चाई भी है ऐसे में बुजुर्गों को जो शारीरिक रूप से असमर्थ नहीं हैं उनको ज्यादा से ज्यादा युवाओं के घर सम्बन्धी कार्यों में हाथ बटाना चाहिए क्यूंकि एक सवाल तो उनके लिए भी है की कभी वे भी युवा थे और उस समय उन्होंने अपने बुजुर्गों की कितनी सेवा की थी इस सच्चाई को भी याद करना चाहिए अतः समय का यही तकाजा है की बुजुर्ग अपने आप को युवाओं की जरुरत बनायें रखने का प्रयास करें न की उनके लिए बोझ बने हमेशा जब अपेक्षाएं ज्यादा होती हैं और उनकी पूर्ती नहीं होती तो मानसिक पीड़ा होती है अतः अपेक्षाओं को कम रखना चाहिए और युवाओं की जरुरत बने रहना चाहिए अगर बुजुर्ग ऐसा कर पाते हैं तो उनको समुचित आदर जरूर मिलेगा आपने एक सार्थक आलेख लिखा है आशा करता हूँ आपके इस सार्थक आलेख से बाकि के बुजुर्ग लोग प्रेरणा जरुर लेंगे और अपना बुढ़ापा सफल और सार्थक बनायेंगे .

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है की हमेशा युवा पीढ़ी बुजुर्गों की उपेक्षा के लिए जिम्मेदार नहीं होती,यदि बुजर्ग बदलते परिवेश को समझते हुए युवा वर्ग की परेशानियों,अपेक्षाओं,महत्वाकांक्षाओं को जाने और समझें,उनके चुनौती भरे जीवन में सहयोगी बनकर, नयी विकास धारा को अपनाने का प्रयास करें, तो वे अवश्य ही नयी पीढ़ी से सम्मान,प्यार एवं सहयोग पा सकते हैं। नयी पीढ़ी को भी बुजुर्गो के समय को याद करते हुए उनके विचारों के प्रति सहनशील होना चाहिए और यथा संभव अधिकतम सहयोग देकर उन्हें संतुष्ट रखने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार मानव सभ्यता की जीत होगी,और वर्तमान युवा पीढ़ी को भी भविष्य में आने वाला उनका बुढ़ापा सुरक्षित बीतने की सम्भावना बढ़ जाएगी। आदरणीय अग्रवाल साहब, नमस्कार! सामंजस्य बैठाकर चलना जरूरी है अन्यथा तो आये दिन देख सुन रहे ही हैं! महत्वपूर्ण पोस्ट के लिए आभार!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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उदाहरण स्वरूप कुछ दशक पूर्व ऍम बी बी एस की डिग्री प्राप्त कर डॉक्टर के लिए सम्मानिये स्थिति होती थी,उसे योग्य एवं सम्मान्निये व्यक्ति माना जाता था। आज जीवन में कामयाब होने के लिए एम् डी,एम् एस की डिग्री प्राप्त कर चिकित्सा करने वाले ही सुविधा संपन्न डॉक्टर बन पाते हैं, समाज में सम्मानीय हो पाते हैं। इसी प्रकार अभियंता के लिए जहाँ पहले मात्र डिप्लोमा या स्नातक की डिग्री ही काफी थी। आज तकनीक का स्नातकोत्तर होना आवश्यक हो गया है(एम् ई,एम् टेक आदि )इसी प्रकार से अन्य व्यवसायों में जो लोग कुछ नया दिखा पाते हैं या विशिष्ट योग्यता रखते हैं वे ही उन्नति कर पाते हैं।अब यह भी आवश्यक नहीं रहा गया है की परंपरागत व्यवसायों(इंजिनियर,डाक्टर इत्यादि ) में पारंगत होने पर ही उसे सफलता मिलेगी,बल्कि नयी तकनीक के साथ साथ अनेकों नए क्षेत्र खुले हैं,अपनी रूचि के अनुसार उन क्षेत्रों में जाकर, अपनी योग्यता दिखा कर भी जीवन को सफल बनाया जा सकता ह, बहुत सार्थक पोस्ट आदरणीय श्री सत्यशील अग्रवाल जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय सत्य शील जी आपके विचार अति सुंदर हैं / विद्यार्थियों के लिए अध्यन की अवधि और उसके बाद सार्वजानिक जीवन में भी प्रतिस्पर्धात्मक होना ही विद्यार्थी जीवन की सफलता की कुंजी है ? लेकिन कहीं जब सार्वजनिक जीवन में यही प्रतिस्पर्धा धन कमाने की पिपासा बन जाती है तो व्यक्ति न तो विद्यार्थी रह जाता है और न ही व्यक्ति ही बन पाता है केवल एक अंधी दौड़ का घोडा बनकर पैसा बनाने की मशीन मात्र हो जाता है ? इस लिए मेरे विचार से विद्यार्थियों को सिर्फ किसी भी क्षेत्र में मात्र योग्यता प्राप्त कर लेने से ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। उन्हें संस्कारवान भी बनाना चाहिए जिससे की आगे चाल एक अच्छा पिता एक अच्छा नागरिक एक अच्छा नेता या अधिकारी या कर्मचारी भी बन सके ? आपके अच्छे विचारों के लिए धन्यावाद. एस पी सिंह.

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आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया

के द्वारा: ऋषभ शुक्ला ऋषभ शुक्ला

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अतः समाज को अपराध मुक्त रखने के लिए आवश्यक है,शिक्षा में चरित्र निर्माण पर विशेष जोर दिया जाय,जनता की मूल समस्याओं का समाधान शीघ्र से शीघ्र किया जाय,समाज में पनपने वाले असंतोष को समय रहते दूर किया जाय,समाज में साधनों की असमानता का अंतर निम्नतम करने के प्रयास हों, अपराधी को शीघ्र से शीघ्र सजा देने की व्यवस्था की जाय,और किसी भी अपराधी को सजा से बच पाने के अवसर न मिल पाए। विदित है इन सभी उपायों के लिए शासन और प्रशासन की इच्छा शक्ति का होना अत्यंत आवश्यक है। आदरणीय अग्रवाल साहब, सादर अभिवादन! आपके आलेख हमेशा ही समाज के लिए उपयोगी होते हैं. आपने जो जो कारन चिन्हित किये हैं वे सभी गौर के लायक है, पर हमारे नीति निर्धारक इस पर ध्यान दें तब न! वे तो इन्हें बढ़ने का ही काम करते हैं! बांटो और राज करो! गरीब और अभाव ग्रस्त जनता ही इनका वोटर होती है!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

श्री सत्यशील जी ..... सादर नमन समाज में अपराध को देखते हुए जो वर्तमान स्थिति है वह चिंता का विषय है ... परन्तु वह चिंता कहीं हद तक तब कम हो जाती है जब आप जैसे व्यक्ति इन विषयो को लेकर सहर्ष जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं और इतना ही नहीं बल्कि उसके लिए निरंतर तत्पर भी रहते है। जिस वैज्ञानिक शोधानुसार आपने अपराध बढ़ने के कारणों को रेखांकित किया है मै और शायद हर व्यक्ति आपके इस चिंतन से पूर्णतः सहमत होगा ... पर दुख तो तब होता है जब भारत की सरकार ऐसे कदमो एवं उपायों का हमेशा स्वागत तो करती है पर कदम उठाने के लिए सफेद हाथी का रूप धारण कर लेती है। पर आपने इस विषय पर अपना योगदान दिया ... आपके इन विचारो के लिए आपका आभार ...।

के द्वारा: RAHUL YADAV RAHUL YADAV

क्योंकि टक्कर हो जाने या दुर्घटना के भय से हम गाड़ी या स्कूटर चलाना तो बंद नहीं कर सकते,परन्तु गाड़ी चलाने वाले को सुरक्षित चलने की हिदायत तो दे सकते हैं,बाकि उसकी मर्जी वह अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ करता है या संभल कर गाड़ी चलाता है।इसी प्रकार से महिलाओं की गतिविधियों पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता,और न ही लगना चाहिए,सिर्फ उन्हें सुरक्षित रहने और आत्म रक्षा के उपाए सुझाये जाने चाहिए। इस लेख का आशय यही है की हमें स्वयं अपने धन, दौलत, इज्जत की स्वयं रक्षा करने लिए तत्पर रहना चाहिए।शासन प्रशासन की जिम्मेदारी समझ कर स्वयं लापरवाही बरतना अपने लिए जोखिम बढ़ाना है.सचेत रहना ही एक मात्र उपाय है जो हमें देश में बढ़ रही अराजकता के माहौल में अपने को सुरक्षित रख सकता है। सुखी समाज हेतु आपके प्रयास को सादर नमन आदरणीय अग्रवाल जी सादर बधाई. सपरिवार होली मुबारक

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

" प्रत्येक युवा का स्वप्न होता है की, वह अपने जीवन में सभी सुख सुविधाओं से सुसज्जित शानदार भवन का मालिक हो. प्रत्येक युवा की इस महत्वाकांक्षा के कारण ही प्रत्येक क्षेत्र में गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा उत्पन्न हुई है.अब वह चाहे शिक्षा पाने के लिए स्कूल या कालेज में प्रवेश का प्रश्न हो या नौकरी पाने के लिए मारामारी हो. रोजगार पाने के लिए व्यापार ,व्यवसाय की प्रतिस्पर्द्धा हो या अपने रोजगार को उच्चतम शिखर पर ले जाने की होड़ हो या फिर अपनी नौकरी में उन्नति पाने के अवसरों की चुनौती हो" ये बाते आज की समस्या का सबसे बड़ा कारण है.... आपने सभी बातें सटीक और स्वच्छ्ता से रखी है... धन ... आपसी रिश्तों के प्रेम के बीच आ गया है.... बस यही बात सभी को समझना है.... बाकी उपाय तो अपने आप ही... होने लगेगा... आपको बधाई.... http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2013/03/15/%E0%A4%A2%E0%A5%82%E0%A4%81%E0%A4%A2%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%81-%E0%A4%AF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81/

के द्वारा: bhagwanbabu bhagwanbabu

युवा वर्ग का रवैया बुज़ुर्गों के प्रति सत्य शील अग्रवाल जी का लेख सराहनीय है क्योंकि आज के युग में यह विचार विमर्श का विषयों बन चुका है । सच तो यह है कि बुज़ुर्गों और युवाओं के संबंध एक बैटन रेस की तरह है जो पीड़ी दर पीड़ी चलती आ रही । ज़्यादातर यह देखा गया है कि परिवार में बुज़ुर्गों का आदर सम्मान एक परम्परा है । हर युवा पीड़ी अपने बड़ों को सम्मान देने के लिये बाध्य है और हर बुज़ुर्ग अपने छोटों को प्यार दुलार और यथा सम्भव सहायता करने के लिये ज़िम्मेवार है ।किसी भी घर के बच्चे अपने माता पिता का जैसा व्यवहार बाबा दादी या नाना नानी के प्रति देखेंगे उसी पर बड़े होकर उनका अपने माता पिता प्रति व्यवहार निर्भर करेगा । यदि उन्हें बाबा दादी का स्नेह मिला है और उन्होंने उनको माता पिता द्वारा अपमानित होते हुए देखा है तो वह कभी भी बड़े होकर अपनेमाता पिता को सम्मान नहीं देंगे । पिछले बीस पच्चीस सालों मे पूरे विश्व मे एक ज़बरदस्त आर्थिक बदलाव आया है अब नौकरी लगते ही युवक अपना घर बनवाते हैं, साथ ही आज के वृद्ध जीवन बीमा तथा स्वास्थ्य बीमा लेकर बच्चों पर कम निर्भर हैं । दोनो ही अपने को एक दूसरे से स्वतंत्र समझते हैं । यही वजह है कि दोनो के बीच लगाव कम और प्रति द्वंद की सी भावना ज़्यादा है। बुज़ुर्ग अपने को निर्भर मानने मे हेठी समझते हैं और युवा उनकी सलह मश्वरे को हस्तक्षेप समझते हैं । कोई इस बात को मानने को राज़ी नहीं है कि दोनो को एक दूसरे के पास होने से बहुत से फ़ायदे हैं । इस का सबसे अच्छा उधारण उन धरें में है जहाँ युवक और युवती दोनो काम पर जाते हैं । फिर भी कई घरों में बुज़ुर्गों का अस्तित्व एक बिना मूल्य के नौकर सा बन कर रहा दिखाई देता है । यदि बुज़ुर्ग जब तक बन पड़े अपने बच्चों की हर मुमकिन मदद करें सिर्फ़ यही सोच कर कि एक ना एक िदन तो उन्हें बच्चों की मदद की ज़रूरत पड़ेगी, और बच्चे उनकी दी हुई मदद को याद रखें तो आपस का रवैया अपने आप ठीक दिशा मे चलता रहेगा  ।

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आदरणीय सत्यशील जी , मैंने आपका लेख '' अपनी बेटियों को अच्छे ---- ''। पर सत्य जी हम सभी सिर्फ अपनी बेटियों को ही अच्छे संस्कार देने की ही क्यूँ बात करते है ? कोई बेटों को क्यों नहीं बताता कि एक अच्छे पति के गुण क्या होते हैं या लडकियों की इज्जत कैसे की जाती है ? सत्य जी आज भारत में जो यौन अपराध बढ़ रहे हैं उसकी वजह बेटों को अच्छे संस्कार ना देना है । सबसे बड़ी हमारे समाज की बिडम्बना यह है कि एक औरत की सबसे बड़ी प्रतिद्वन्दी उसकी अपनी ही बहू है । उसकी वजह उसकी निम्न सोच कि उसने आकर मेरे बेटे को मुझसे छीन लिया और अफ़सोस यह है कि आज भी यह सोच हमारी पढ़ी लिखी सासों में मौजूद है । जब कि सम्बन्ध तो दोनों तरफ से ही निभाए जाते हैं ।

के द्वारा: Manisha Singh Raghav Manisha Singh Raghav

सफलता,असफलता प्राप्त करने में ,या चरित्र का निर्माण करने में अभिभावक और माता पिता के योगदान को नाकारा नहीं जा सकता.यदि सफलता का श्रेय माता पिता को मिलता है तो उसके चारित्रिक पतन या उसके व्यक्तित्व विकास के अवरुद्ध होने के लिए भी माता पिता की लापरवाही , उचित मार्गदर्शन दे पाने की क्षमता का अभाव जिम्मेदार होती है.जबकि युवा वर्ग कुछ भिन्न प्रकार से अपनी सोच रखता है.वह सफलता का श्रेय सिर्फ अपनी मेहनत और लगन को देता है और असफलता के लिए बुजुर्गो को दोषी ठहराता है.आप हमेशा ही सामाजिक लेख लिखते हैं और बेहतरीन लिखते हैं ! क्या हम अपने बुजुर्गों को सहेज कर नहीं रख सकते? क्या वे हमारे मार्ग दर्शक नहीं बन सकते?” “वर्तमान में युवावस्था के प्रत्येक व्यक्ति को अहसास होना चाहिए की कल वे भी आज के प्रौढों के स्थान पर खड़े होंगे”बहुत सुन्दर विचार आदरणीय श्री सत्य शील अग्रवाल जी

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सत्यशील जी आपने राजनीती का सच लिखा है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह की आज अपने देश में एक मजबूत बिपक्ष की भारी कमी है हालाँकि क्षेत्रीय पार्टियाँ अपने अपने प्रदेशों में अच्छा काम कर रहीं हैं विकास भी कर रही हैं और वहां की जनता में दिनोदिन लोकप्रिय भी होती जा रही हैं यहाँ तक की बीजेपी भी राज्यों में अच्छा प्रदर्शन कर रही है और अपने देश में राष्ट्रिय दल के नाम पर मात्र दो ही पार्टियां हैं एक कांग्रेस और दूसरा बीजेपी अब बीजेपी कुछ प्रदेशों में गठबंधन की सरकार में चला रही हैं है इसका एक उदाहरन बिहार राज्य भी है जहाँ बीजेपी और जदयू मिलकर अच्छा काम कर रहें हैं और कानून ब्यवस्था को बनाये रखने में सक्षम हैं जो लालू राज्य में समाप्त हो गया था अतः जरुर आज अपना देश कांग्रेस पार्टी की मनमानी का शिकार है जो आज भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त है और नित नए घोटाले उजाघर हो रहें हैं महंगाई चरम सीमा पर है जनता बेहाल है और सत्ता में बैठी कांग्रेस बेपरवाह है और कहती है महंगाई तो और बढ़ेगी यानि जले पर नमक छिड़कने वाला काम आज सरकार कर रही है और कांग्रेस में इतने अनुभवी नेताओं के होते हुए भी गाँधी परिवार का ही ब्यक्ति शीर्ष पर बिराजमान रहता है और आज कांग्रेस के युवराज श्री राहुल गाँधी कांग्रेस के भावी पी एम् के उम्मीदवार घोषित किये जा चुके हैं और इसका विरोध करने का साहस कांग्रेस पार्टी के किसी नेता के बूते की बात नहीं और आजादी के ६५ साल बीत गएँ हैं कोई दूसरी पार्टी इस देश में ज्यादा साल टिक नहीं पायी और दूसरी पार्टियों में महत्वकांक्षी नेताओं की भरमार है हर कोई पी एम् ही बंनना चाहता है जो कैसे संभव है? एक कांग्रेस पार्टी ही ऐसी पार्टी है जिसमे एक बार घोषणा हो गयी फिर उसका समर्थन तो भले सारे ना करें पर किसीकी हिम्मत नहीं, उसका विरोध कर पायें और इसीके चलते उनका संगठन मजबूत है अन्तर्विरोध का प्रश्न ही नहीं है लेकिन बीजेपी में भले आज नरेन्द्र मोदी को पी एम् का उम्मीदवार घोषित करने की कवायद चल रही है लेकिन मोदी सर्वमान्य हैं यह जानना अभी बाकि है अब तो चुनाव नजदीक हैं और अगर चुनाव में फिर से कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती है तो राहुल का पी एम् बनना तय है भले उनको देश के बारे में कोई जानकारी हो न हो राजनितिक अनुभव हो न हो फिर भी जैसे मनमोहन सिंह बिना बोले १० साल राज कर लिए राहुल भी कर लेंगे क्यूंकि उनके सलाहकार तो अनुभवी हैं देश का क्या, है पहले भी चल रहा था अब भी चलेगा और आम जनता की हालत न पहले सुधरी थी न अब सुधरेगी गरीब अति गरीब होता जायेगा और अमीर और अमीर बनता जायेगा आपका लेख देश की पिछले ६५ साल की राजनितिक इतिहास बताता है

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अतः सर्वाधिक आसान कार्य है धार्मिक प्रवचन दाता बनना। सिर्फ शर्त है आप की बुद्धिमत्ता का स्तर आई ए एस के लेवल का हो,आपका शारीरिक सौष्ठव उच्च स्तर का होना चाहिए. जनता में बढ़ने वाली धार्मिकता का कारण उन्नति के इस दौड़ में गरीब और अमीर के बीच बढ़ रही खायी भी मुख्य वजह हो सकती है।प्रत्येक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा उच्च से उच्च जीवन स्तर को पा लेने की हो रही है, जब वह अपने लक्ष्य को पाने में स्वयं को अक्षम पाता है तो अवसाद ग्रस्त हो जाता है,यही स्थिति उसे शांति की खोज के लिए मजबूर करती है,धार्मिक आस्था बढ़ने के साथ साथ बाबाओं की दुकानदारी चमकने लगती है,संतो का धंधा फलने फूलने लगता है और आज के वैज्ञानिक युग में भी धार्मिक आस्था के परचम को बुलंद करता है।सभी वैज्ञानिक मान्यताएं,वैज्ञानिक शोध महत्वहीन हो जाते हैं. बिलकुल सही कहा आपने श्री सत्यशील अग्रवाल जी ! इसके लिए थोड़ी जुगाड़ बंदी , थोड़े श्रोता और अगर संभव हो तो विज्ञापन का प्रबंध भी आवश्यक रूप से कर लेना चाहिए ! बहुत सुन्दर विषय उठाया आपने और सार्थक लिखा !

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जनता में बढ़ने वाली धार्मिकता का कारण उन्नति के इस दौड़ में गरीब और अमीर के बीच बढ़ रही खायी भी मुख्य वजह हो सकती है।प्रत्येक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा उच्च से उच्च जीवन स्तर को पा लेने की हो रही है, जब वह अपने लक्ष्य को पाने में स्वयं को अक्षम पाता है तो अवसाद ग्रस्त हो जाता है,यही स्थिति उसे शांति की खोज के लिए मजबूर करती है,धार्मिक आस्था बढ़ने के साथ साथ बाबाओं की दुकानदारी चमकने लगती है,संतो का धंधा फलने फूलने लगता है और आज के वैज्ञानिक युग में भी धार्मिक आस्था के परचम को बुलंद करता है। अंतिम पैराग्राफ में आपने निष्कर्ष भी दे दिया!... और क्या हो सकता है इसका कारण! आश्चर्य तो आज हुआ तो बड़े अधिकारी पकड़े गए मीडिया के कमरे में जो चोरी छिपे वी आई पी घाट पर सपरिवार गाडी सहित गए थे और वहां से मुंह छिपाकर वापस लौट रहे थे... पर पकडे गए बेचारे यह कहते हुए की मालूम न था ... इस तरह भी पुन्य कमाया जाता है या पाप धोया जाता है तो इसका मतलब क्या है ?????

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योगी सरस्वत जी। जब किसी परिवार का जवान और कमाऊ बेटा या बेटी की मृत्यु हो जाती है तब भी ये सब किया जाता है। तो क्या हम तब भी उसका जश्न मनाए। यह एक दक़ियानूसी विचार है और उतना ही अच्छा होगा जितनी जल्दी हम इसे त्याग दे तभी एक आधुनिक और सम्बृध भारत कनिर्मान होगा। अन्यथा परंपरों के नाम पर हम लुटते ही रहेंगे। कान छेदन के बारे मे लोगो का विचार है जैसे जानवरो कि नाक छेड़ कर उन्हे नियंत्रित किया जाता है उसी तरह महिलाओ को नाक कान छिदवा कर इन्हे नियंत्रित किया जाना चाहिए। आज के समय मे यह विचार कहा तक व्यावहारिक है। महिलाओ को एक लोलिपोप दे दिया गया है कि वो इससे और सुंदर लगेंगी लेकिन बिना नाक कान छिदाए हुये महिलाए और भी सुंदर लगती है। तो इन्हे जितनी भी जल्दी हो सके बंद किया जाना चाहिए।

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ऐसा व्यक्ति बहुत ही दयनीय भी होता जो दूसरों के साथ ही अपना जीवन भी नरक बनाए रखता है। ये एक सामंती स्वभाव है ऐसे व्यक्ति लोकतांत्रिक मूल्यों से दूर होते हैं। माता या पिता तानाशाही प्रवृति के हो तो कभी-कभी बच्चे उनसे विद्रोह भी कर बैठते हैं। समाज के साथ ही परिवार में भी लोकतंत्र होना आवश्यक है। परिवार के हर व्यक्ति को उससे संबंधित हर निर्णय में भागीदार होने का ह़क होना चाहिए। छोटों के प्रति बड़ों की तानाशाही को तो हमारे समाज में इतनी स्वीकार्यता मिली हुई कि ऐसी तानाशाही को काफी स्वभाविक भी माना जाता है। हर तरह की तानाशाही का अन्त होना चाहिए तभी हमारे संबंध संतुलित और मैत्रिपूर्ण हो सकते हैं। इस बेहतरीन विश्लेषण को प्रस्तुत करने के लिए आपका आभार।

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यदि देश में कोई निर्धनता के स्तर से नीचे जीवन यापन करने वाला न हो तो, शायद ही कोई महिला सेरोगेसी को स्वीकार करेगी.जिससे निष्कर्ष निकलता है समस्या सेरोगेसी के चलन में नहीं है बल्कि समस्या हमारे देश या अन्य एशियाई देशो की दरिद्रता में निहित है , लेखन और विषय की जितनी तारीफ करी जाए कम होगी क्यूंकि आपने सच में बहुत जानकारी वाला और सम्प्पर्ण लेख लिखा है ! एक बात जो मुझे याद आती है - पलामी की कोई महिला सरोगेट मदर बनी थी ऑस्ट्रेलियाई कपल के लिए ( ये आज से १०-१५ साल पहले की बात है ) जब उसे बच्छा वापस देने की बात आई तो वो मुकर गयी क्योंकि वो उसका अपना ही खून था और वो उस बच्चे को लेकर फरार हो गयी ! के सर्वोच्च न्यायलय में गया और कोर्ट ने फैसला ऑस्ट्रेलिया के दम्पति के पक्ष में दिया , तब तक बच्चे की उम्र ५ साल हो चुकी थी ! बच्चा आखिर उन्हें ही मिला और मातृत्व का खून हुआ ! ये गरीबी ही है जो ये व्यवसाय को बढ़ा रही है

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