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अन्ना जी और गाँधी जी(JAGRAN JUNCTION FORUM )

Posted On: 30 Aug, 2011 में

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अन्ना जी के भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन की सफलता के पश्चात्, एक बहस छिड़ गयी है की क्या अन्नाजी को गाँधी जी के समकक्ष रखना उचित होगा.अन्ना जी की तुलना गाँधी जी से करना न्याय संगत है क्या? क्या अन्ना जी का कद गाँधी जी से भी बड़ा हो गया है? जागरण फोरम ने भी इस मुद्दे को बहस का विषय बनाया है.
मैं अपने विचार से अन्ना जी के कद को गाँधी जी कद से बड़ा मानता हूँ और अपने विचार के समर्थन में अपने निम्न लिखित तर्क प्रस्तुत करता हूँ. ताकि प्रत्येक विचार शील व्यक्ति मेरी बात को समर्थन दे सके
गाँधी जी के स्वतंत्रता आन्दोलन के समय अनेक स्वतंत्रता सेनानी आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे. अर्थात नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ,स्वामी विवेकानंद,लाला लाजपत राय,बाबा साहेब अम्बेडकर,जवाहर लाल नेहरु जैसे अनेको नमी गिरामी नेता स्वतंत्रता आन्दोलन को चला रहे थे. परन्तु वर्तमान आन्दोलन के मात्र एक ही सूत्रधार हैं,श्री अन्ना हजारे, जो अपनी टीम के सदस्यों के साहसिक सहयोग के साथ आगे बढ़ रहे थे.अन्य कोई पार्टी,कोई नेता इस आन्दोलन को नहीं चला रहा था. स्वामी रामदेव के आन्दोलन को अवश्य सहयोगी नेतृत्व कहा जा सकता है परन्तु रणनीतिकारों के अभाव में वे प्रभावशाली नेतृत्व नहीं कर पाए.
गाँधी जी सुविधा संपन्न पारिवारिक प्रष्ट भूमि से आए थे, अतः शिक्षा प्राप्त करने का पर्याप्त अवसर मिला,जो आन्दोलन को चलाने के लिए महत्वपूर्ण मार्ग दर्शन उपलब्ध कराता है.परन्तु श्री अन्ना हजारे एक बेहद गरीब एवं पिछड़े माहौल से आए थे, इसी कारण शिक्षा भी ग्रहण नहीं कर पाए मात्र प्राइमरी शिक्षा तक अध्ययन कर सके. फिर भी इतने बड़े आन्दोलन का नेतृत्व कर पाने में सफल हुए.
अन्ना जी की लोकप्रियता को गाँधी जी की लोकप्रियता से किसी भी प्रकार से कम नहीं आंका जा सकता. उनका देश के लिए संघर्ष रत जीवन, जो करीब चालीस वर्ष है कम नहीं माना जा सकता. जिसमे उन्होंने जनता को अनेकों समस्याओं से निजात दिलाई है.राष्ट्रिय स्तर पर यह उनकी पहली सफलता है. इनकी लड़ाई को आजादी की लड़ाई से कम नहीं माना जा सकता बल्कि यह संघर्ष अधिक जटिल संघर्ष है. क्योंकि विदेशी सरकार से लड़ना आसान होता बनिस्वत अपनी सरकार के अर्थात अपनों से लड़ना अधिक चुनौती पूर्ण होता है.
अन्ना जी का आन्दोलन गाँधी दर्शन पर आधारित था ,अतः यदि अन्ना जी को गाँधी जी का अनुयायी कहने में कोई परहेज नहीं होना चाहिए उनके सिद्धांतों के कारण ही आन्दोलन को अहिंसक तरीका अपना कर सफल बनाया जा सका. परन्तु गाँधी जी के सिद्धांतों पर चल कर यदि कोई व्यक्ति गाँधी जी के कद से ऊपर कद बना लेता तो यह स्वयं गाँधी जी के सम्मान से कम नहीं है.
सत्य शील अग्रवाल

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

KKVerma Advocate Bulandshahr U.P. के द्वारा
07/09/2011

Satyasheel ji, What a grand ideas have you presented , I fully appreciate you. Thanks.

डॉ,मनोज रस्तोगी के द्वारा
03/09/2011

मैं आपके विचारों से सहमत हूँ .

s.p.singh के द्वारा
31/08/2011

हांलाकि मैं ३० नवम्बर तक के लिए किसी ब्लॉग को लिखने और टिपण्णी करने से अपने आपको प्रतिबंधित कर लिया था परन्तु आज के जवलंत विषय पर आपकी ओर (जागरण टीम) “क्या अन्ना हमारे दौर के गांधी हैं ?” विषय पर विचार आमंत्रित करने के कारण मैं अपने आपको नहीं रोक पाया ; इस विषय पर मेरे अपने कुछ विचार है : प्रथम तो यह की अन्ना की तुलना गाँधी से करना नितांत बच्चों जैसा प्रशन है, गाँधी जी ने भारतीय ही नहीं अफ्रीकियों की दयनीय स्तिथि से विचलित होकर कुछ सामाजिक जाग्रति पैदा करने की ठानी थी जब याता- यात और संचार माध्यमो का आभाव था और उस पर सरकारी नियंत्रण था और वह एक पढ़े लिखे समझदार व्यक्ति थे कानून के ज्ञाता थे किसी भी आन्दोलन को करने और सम्हालने की कुव्वत रखते थे उनका सबसे बड़ा हथियार अंहिसा ही था जो उनकी अपनी थ्योरी पर आधारित था कि केवल भारत में राज करने वाले ३५ हजार अंग्रेजों को ३५ करोड़ भारतीय अगर लात -घूंसों से मारेंगे तो वह मर जायंगे इस लिए हथियारों कि कोई आवश्यकता नहीं है आजादी कि लड़ाई लड़ने के लिए ? इस कारण भारत का प्रत्येक नागरिक उनके साथ था ? दूसरी यह कि अन्ना हजारे कि शिक्षा के विषय क्या कहना सब जानते हैं लेकिन उनका साधारण रहन सहन एवं सामाजिक ज्ञान अवश्य तारीफ के काबिल है परन्तु कानूनी ज्ञान के लिए वह दो वकील बाप बेटों एवं असंतुष्ट ग्रुप के रिटायर्ड अधिकारीयों पर निर्भर है जिनकी सोच सामाजिक सरोकार न होकर सरकार का विरोध करने जैसा लगता है – जिसमे वह अपनी अपनी छवि चमकाने में अधिक उपयोग कर रहे हैं ? इस लिए भी गांधीजी से तुलना किसी भी प्रकार से नहीं कि जाती गाँधी जी आन्दोलन को अपने हाथ में लेकर चलते थे जनता उनके पीछे चलती थी यहाँ उल्टा है कथित स्वयंभू सिविल सोसाइटी के करता धर्ताओं ने एक सीधे सादे इंसान में हवा भर कर एक अनजाने से स्थान से उठा कर दिल्ली के जंतर मंतर पर बैठा कर अपने हित साधने में आज उनकी जान भी लेने में कोई संकोच नहीं कर रहे हैं ? एक बार को यह भी मान लिया जाये कि यह सब आन्दोलन जनता कि भलाई के नाम पर किया जा रहा है पर जिनके खिलाफ किया जा रहा है वह भी तो भारतीय जनता ही है ? यह आन्दोलन जिन सरकारी कर्मचारियों अधिकारीयों के खिलाफ है तो क्या उनमे बहुसंख्य दलित और पिछड़ा वर्ग नहीं है तो क्या यह माना जाय कि लोकपाल बिल में निचले स्तर के कर्मचारियों और अधिकारीयों को शामिल करने के मांग क्या दलित और पिछड़ा वर्ग के विरुद्ध नहीं है ? तीसरा यह कि क्या कथित सिविल सोसाइटी में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो अन्ना हजारे के साथ एक दिन या फिर क्रमिक अनशन (भूख हड़ताल ) बैठने लायक कुव्वत रखता हो – इस इन्टरनेट के युग में फेश बुक /ट्विटर या फिर मोबाईल एस एम् एस द्वारा लोगों को जोड़ने और उनको सभी सुविधा देकर धरना स्थल पर लाना भी अपने आप में एक सवाल खड़ा करता है ? चौथा और सबसे बड़ा कारण यह कि भारत के लोगों कि याददास्त जरा कमजोर ही है अगर ऐसा न होता तो इस देश में आपातकाल के बाद कांग्रेस के पतन के बाद कांग्रेस का नाम लेने वाला कोई भी नहीं होता ? क्या ऐसा संभव नहीं था परन्तु इस देश के दूसरी श्रेणी के नेताओं में वह कुव्वत ही नहीं थी जिस कारण कांग्रेस दुबारा से जिन्दा हो गई और जनता अपने आपको ठगा सा महसूश करने लगी ? और ऐसा भी नहीं है कि १९७४ के श्री जय प्रकाश नारायण के आन्दोलन से कोई नेता नहीं उपजा था बहुत से नेता बने पर उनका चरित्र सबके सामने है ? गाँधी के दर्शन में हिन्दू मुश्लिम सिख इसाई सब सामान थे और सभी आन्दोलन में शामिल थे लेकिन यहाँ उल्टा है न तो मुस्लिम है न सिख है और न ही दलित ही है तो फिर पुरे भारत का दावा कैसा इसाई का सवाल ही पैदा नहीं होता ? पांचवा और आखिरी कारण यह कि आज विरोधी पार्टी जो ७ वर्षो तक सत्ता का स्वाद चख चुकी और उसके सत्ता के भागिदार यह कतई बर्दास्त करने के मूड में नहीं है कि उनको राज करना नहीं आता या जनता ने उन्हें २००४ में ख़ारिज कर दिया था – यही नहीं उनका मात्र-पितृ संघटन जो कि अपने आपको सांस्कृतिक संघटन कहते थकता नहीं उसके पदाधिकारी भारतीय जनता पार्टी में आते जाते रहते है यहाँ तक कि मुख्या मंत्री भी बनते है यही कारण है कि अन्ना के इस आन्दोलन को संघटन ने हाइजैक कर लिया है और चेहरा तो अन्ना का ही है लेकिन दिमाग किसीतीसरे का ही चलता है (यहाँ कथित सिविल सोसाइटी ) कि भी चलने नहीं देते ? इस लिए श्री श्री अन्ना हजारे कि तुलना गाँधी से करना बिलकुल ही गलत है, हाँ गाँधी का अनुसरण करने वाला तो कोई भी हो सकता है परन्तु गाँधी जैसा कोई न तो पहले हुआ है और न ही कोई आगे पैदा हो सकता है ? यही कारण है कि कुछ लाख लोगो कि भीड़ जुटा लेने से कोई भारत के १२१ करोड़ जनता का प्रतिनिधि होने का दावा तो कर सकता है पर हो नही सकता – ऐसा ही दावा बाबा राम देव ने भी किया था जो यह कहते नहीं थकते थे कि वह १२१ करोड़ जनता के प्रतिनिधि है परन्तु आज केवल नगद दो ही है एक राम देव दुसरे बाल कृषण जिनको अपने लगी को छुडाने में पशीना आ रहा है ? इश्वर अन्ना हजारे की रक्षा करे इस चौकड़ी से ? सिंह एस. पी. मेरठ

manoj singh के द्वारा
30/08/2011

सत्‍य शील जी नमस्‍कार । मैं आपके विचारों से लगभग सहमत हूँ। अन्‍ना और गॉधी पर मैने भी कुछ लखिने का प्रयास किया है। यह मेरा पहला ही ब्‍लॉग है। आपसे अनुरोध है कि उसपर अपने विचार अवश्‍य दें। आभारी रहूँगा। mjsingh.jagranjunction.com

Rajkamal Sharma के द्वारा
30/08/2011

अच्छा विश्लेषण है आपका बधाई

Santosh Kumar के द्वारा
30/08/2011

आदरणीय सर ,.सादर प्रणाम आपका विश्लेषण यथार्थ दर्शाता है ,..अन्नाजी ने गांधीजी के दिखाए रास्ते पर चलकर अपने ही हुक्मरानों से लड़ने का प्रण लिया है ,…ये कोई प्रतियोगिता नहीं,.अनुकरण है ,..लड़ाई अभी शुरू ही हुई है,…रास्ते लम्बे हैं ,…बहुत आभार आपका

manoranjanthakur के द्वारा
30/08/2011

बहुत सुंदर समचिन


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