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गैर जिम्मेदार मीडिया ने किया बंटाधार

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आर्थिक उदारीकरण से पूर्व देश में सिर्फ सरकारी चैनल ही प्रसारण किया करते थे. ये चैनल जनता को वही सब कुछ प्रस्तुत करते थे, जो सत्तारूढ़ नेता जनता के समक्ष पेश करने को आदेशित करते थे. अतः टी.वी. चैनल सरकारी भोंपू के नाम से जाने जाते थे. जनता को एक तरफ़ा समाचार(सरकार द्वारा प्रायोजित) देखने को ही मिल पाते थे. यदि उसे पूरी सच्चाई जाननी होती थी तो बी.बी.सी.लन्दन के रेडियो पर निर्भर रहना पड़ता था. अन्य कोई प्रसारण माध्यम उसे समाचार के सभी पहलुओं की जानकारी नहीं दे पाते थे. प्रिंट मीडिया अवश्य स्वतन्त्र होकर रिपोर्टिंग कर पाता था.परन्तु इस माध्यम से चौबीस घंटे में एक बार ही समाचार मिल सकते हैं.
जब से (1991) हमारे देश में आर्थिक उदारीकरण की व्यवस्था की गयी, निजी क्षेत्र में सैंकड़ो टी.वी. चैनल का पदार्पण हो गया. अनेक निजी न्यूज़ चैनल चौबीस घंटे खबरे प्रसारित करने लगे.समय के साथ साथ दर्शक इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर अधिक निर्भर हो गया है.प्रिंट मीडिया का बर्चस्व कम हो गया है यद्यपि उसकी भूमिका मानव समाज में कम नहीं हुई है.सभी निजी चैनलों में होड़ सी लग गयी दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करने की, उन्हें अपने चैनल से जोड़े रखने के लिए अनेक प्रकार के हथकंडे अपनाये जाने लगे, ताकि उनकी दर्शक संख्या अधिकतम हो सके और अधिक दर्शक आधार से उन्हें विज्ञापन से अच्छी से अच्छी आमदनी प्राप्त हो सके. निजी चैनल पर पूँजी पतियों का अधिपत्य है जो अपनी आमदनी के लिए तो फिक्रमंद रहते ही हैं, अपने चैनल के माध्यम से राजनीति में भी अपनी दखल देने का दम ख़म रखते हैं. प्रत्येक चैनल किसी न किसी पार्टी का अपरोक्ष रूप से समर्थन करता है, कुछ तो किसी एक पार्टी के पिट्ठू के तौर पर भी कार्य करते है, ताकि जनता में सम्बंधित पार्टी की विचारधारा का प्रचार प्रसार होता रहे.अतः किसी भी चेनल की निष्पक्षता की गारंटी नहीं ली जा सकती.परन्तु अनेक चेनल होने के कारण सच्चाई छिप नहीं सकती.
हमारे देश में सभी को संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, और मीडिया(इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट दोनों) को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है. मीडिया ही लोकतंत्र का सजग प्रहरी है जो सरकार की प्रत्येक गतिविधि पर नजर रखता है और जनता को जागरूक करता रहता है.मीडिया की सजगता के अभाव में सरकार के काले कारनामों(भ्रष्टाचार या अनियमितता) का किसी को भी पता चलना मुश्किल हो सकता है. मीडिया देश के किसी भी भाग में किसी भी वर्ग के विरुद्ध कोई अवांछित कार्य होता है, तो मीडिया ही सबसे पहले रहस्य उजागर कर जनता को जागरूक करता है और सरकार को भी सम्बंधित सन्देश पहुँचाने का कार्य करता है.साथ ही सरकारी सूचनाओं से जनता को अवगत कराता है. सरकार या सरकारी अधिकारियों द्वारा अमानवीय,भ्रष्ट एवं अप्रासगिक कार्यों को करने से रोकता है. राजनेताओं पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी निभाता है.परन्तु दूसरी और वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गलत लाभ भी उठाता है.अभिव्यक्ति की आजादी का यह अर्थ नहीं है की वह कोई भी न्यूज़ जनता को दे और कुछ भी अनर्गल तौर पर बोले.अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उसे एक जिम्मेदारी भी देती है की समाज में व्यवस्था बनाये रखने के लिए भ्रामक ख़बरों से परहेज करे,नकारात्मक ख़बरों को कम से कम प्रमुखता दे.किसी भी समाचार को प्रसारित करने से पूर्व जनता के मानस पटल पर होने वाले उसके प्रभाव को समझे और देश की एकता, अखंडता को ध्यान में रख कर किसी खबर को प्रमुखता दे.ताकि देश के विरोधियों,आतंकवादियों,अपराधियों को चमकने का अवसर न मिल पाए.यह तो निश्चित है की निजी उद्योगपतियों द्वारा चलाये जा रहे चैनल या समाचार पत्र अपने लाभ के लिए चलाते है,और अधिक टी.आर.पी.उन्हें अधिक आमदनी का जरिया बनाती है और अधिक टी.आर.पी. के लिए ख़बरों का चटपटा, उत्तेजक,विस्मय कारक, खलबली मचाने वाली होना आवश्यक है. यही कारण है की मीडिया अपनी राष्ट्र के प्रति और जनता के प्रति जिम्मेदारी को भूल जाता है और देश की एकता अखंडता पर जाने अनजाने चोट पहुचता रहता है जो देश के भविष्य के लिए खतरनाक है और देश के विरोधियों के हित में है.जब भी कोई सरकार मीडिया पर अंकुश लगाने की बात करती है उन्हें दिशा निर्देश देने की बात करती तो अनेक विरोधी पक्ष की पार्टियाँ मीडिया के पक्ष में अपने तर्क ले कर खड़ी हो जाती है,और सरकार को निरंकुश कहकर बदनाम करने लगती है.

नकारात्मक खबरों का बोल बाला;

मीडिया इलेक्ट्रॉनिक हो या प्रिंट सभी नकारात्मक ख़बरों पर अधिक प्रमुखता देते हैं. जो आम इन्सान को विचलित करते है, उसे डिप्रेशन तक ले जाने में सहायक होते है. जब कोई व्यक्ति सवेरे उठते ही देश में होने वाले आतंक,गुंडा गर्दी,बलात्कार, हिंसा, अपहरण, जैसी घटनाओं को मीडिया द्वारा पढता है उसका मन भी हताश हो जाता है उसका पूरा दिन उदासी की भेंट चढ़ जाता है.जब किसी को नकारात्मक खबरे नित्य और निरंतर पढने या देखने को मिलती रहे तो उसका असर उसके स्वास्थ्य पर भी पड़ता है.परन्तु मीडिया को तो हलचल फ़ैलाने वाली खबरे ही प्रसारित करनी है.क्या इतने बड़े देश में कोई व्यक्ति अच्छे उत्साह वर्द्धक,प्रेरणा दायक कार्य नहीं करता जिससे आम जन को भी कुछ अच्छा करने की प्रेरणा मिले उसका मन उत्पादक कार्यों, समाज सेवा और परमार्थ में लगे और देश को उचित दिशा मिल सके, इन्सान की सोच सकारात्मक बन सके. मोदी जी के आग्रह पर अब कुछ चैनल वालों ने,समाचार पत्रों ने इस ओर सोचना प्रारंभ किया है कुछ कार्यक्रम,आलेख इत्यादि लिखे और प्रसारित भी किये जाने लगे हैं.

उत्तेजक ख़बरों के बोला बाला (चंद उदाहरण)

1,कभी किसी हत्या अथवा बलात्कार की खबर देनी होती है तो पहले पीड़ित की जाति को टटोला जाता है यदि वह दलित जाति का है तो खबर इस प्रकार से फ्लेश की जाती है —-एक दलित छात्र ने आत्म हत्या कर ली अथवा एक दलित महिला के साथ बलात्कार किया गया.क्या बलात्कार का शिकार दलित होने से पीड़ित का दर्द अधिक हो गया या दलित छात्र ने आत्महत्या की तो उसका दुःख अन्य जाति वाले से अधिक था. पीड़ित व्यक्ति कोई भी हो, पीड़ा तो बराबर ही होगी.परन्तु मीडिया का मकसद सिर्फ जनता में सनसनी फैलाना होता है.
2,जब कभी कहीं पर दो व्यक्तियों या दो गुटों में लडाई झगडा,या वाद विवाद होता है और उसे खबर बनानी है तो पहले दोनों गुटों या व्यक्तियों की धर्म के आधार पहचान की जाती है. यदि झगड़ा करने वाले अलग अलग धर्मों के हैं, तो उसे सांप्रदायिक झगडा बता कर समाचार बनाया जाता है और यदि झगडा करने वाले एक ही धर्म के हैं, तो उनकी जाति की पहचान की जाती है.यदि उनमे कोई दलित वर्ग से सम्बन्धित हुआ तो झगडा सवर्ण और दलित के बीच बता कर सनसनी फ़ैलाने का प्रयास किया जाता है.
3,यदि बहुसंख्यक वर्ग के साथ कुछ होता है तो मीडिया के लिए अधिक महत्वपूर्ण नहीं होता परन्तु यदि किसी अल्पसंख्यक वर्ग के साथ कुछ अनहोनी घटना हो जाती है तो इस प्रकार से बढ़ा चढाकर प्रस्तुत किया जाता है, जैसे देश में कोई भूचाल आ गया हो. हाल ही मालदा की घटना सर्वविदित है जहाँ लाखों की संख्या में मुसलमान एकत्र हो होकर पूरी गुंडागर्दी करते हैं,सरकारी और हिन्दुओं की संपत्ति को नष्ट करते हैं मीडिया को सांप सूंघ जाता है. बहुत ही साधारण सी घटना के रूप में किसी किसी चैनल या अख़बार ने बेमन से समाचार दिया.विपक्षी पार्टियाँ भी कहीं गायब हो जाती हैं. परन्तु जब ग्रेटर नॉएडा के गाँव में एक मुस्लिम की हत्या हो जाती है तो पूरा मीडिया उस घटना पर केन्द्रित हो जाता है, तमाम विपक्षी पार्टिया स्यापा करने लगती है, उसे गहरी साजिश बता कर जनता की भावनाओं को भड़काया जाता है.और मीडिया को अपनी दुकानदारी चमकाने को मौका मिल जाता है.
4,जाटो या गूजरों द्वारा आरक्षण के आन्दोलन चलाये जाते है इस दौरान रेल व्यवस्था ठप्प की जाती है सरकारी या निजी संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया जाता है. परन्तु मीडिया हिंसक आन्दोलन की भर्त्सना नहीं करता, सिर्फ आरक्षण की मांग को हाईलाइट करता है. उसकी तीव्रता को बढा चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है, जिससे आम जनता में भय,असुरक्षा का भाव पैदा होता है.
5,विरोधी पार्टी का कोई व्यक्ति,प्रतिबंधित पार्टी का सदस्य,अथवा आतंकवादी अनर्गल वार्तालाप या स्टेटमेंट देता रहता है,उसे भी पता है अटपटी या अनर्गल बातों को मीडिया सुर्खिया बनाकर पेश करता है.अतः जनता में मशहूर होने के लिए, अपनी पहचान बनाने के लिए वह कुछ भी बोलेगा,क्योंकि उसका नाम तो सार्वजानिक हुआ चाहे वह किसी भी रूप में हो. बड़े स्तर पर बदनाम होकर भी नाम तो कमाया. अतः वह मीडिया की कमजोरी का लाभ उठाकर देश के विरुद्ध नारे लगाकर भी प्रसिद्ध होने का प्रयास करते हैं. तो मीडिया उसकी बात को हाईलाइट कर अपने स्वार्थ सिद्ध करती है.इस प्रकार की नकारात्मक खबरे ढूंढ ढूंढ कर लायी जाती है और जनता का मसाले दर खबरों से मनोरंजन किया जाता है.इन खबरों के दूरगामी परिणाम क्या होंगे इस बारे में मीडिया अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश नहीं करता. देश में अराजकता(अव्यवस्था) का माहौल बनाने में कहीं न कहीं मीडिया की गैर जिम्मेदाराना भूमिका स्पष्ट रूप से दिखाई देती है. मीडिया संविधान में दी गयी अभिव्यक्ति की आजादी का दुरूपयोग कर रहा है, उसे जनता और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी का भी अहसास होना चाहिए.सच्चाई का बयान करना भी यदि जनहित में नहीं है ,तो प्रसारण से बचना मीडिया की जिम्मेदारी बनती है. हमारा संविधान अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के साथ साथ जनता के प्रति कर्तव्य निभाने की जिम्मेदारी भी देता है.
गत एक दशक से सोशल मीडिया समाज का प्रमुख अंग बन गया है जिसे नयी पीढ़ी के साथ साथ राजनेता भी जनता में अपनी पैठ बनाने के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग करने लगे हैं.सोशल मीडिया पर तो कोई भी व्यक्ति जिसकी कोई खास पहचान नहीं होती और न ही सरकार से किसी पंजीयन की आवश्यकता होती है उक्त मीडिया कुछ भी लिखा जाय आसानी से अंकुश नहीं लगाया जा सकता यही कारण है इस माध्यम पर ऐसे शब्दों का प्रयोग हो जाता है जो किसी भी धर्म,समुदाय,व्यक्ति या सम्प्रदाय की भावनाओं को भी आहत कर सकता है उसके मान सम्मान को हानि पहुँच सकती है.यदि शीघ्र ही इस माध्यम को कानूनी दिशा नहीं दी गयी तो शायद भविष्य में समाज को सर्वाधिक नुकसान पहुंचा सकता है,सामाजिक ताने बाने को अस्त व्यस्त कर सकता है.
देश  की विदेशों में साख बनाये रखने के लिए,अपने देश में समन्वय भाई चारा,संप्रभुता बनाये रखने के लिए मीडिया कोई भी हो सभी को अपनी जिम्मेदारी निभानी आवश्यक है.भारत सरकार को कानून बनाकर मीडिया को उसकी स्वतंत्रता की सीमाओं को निश्चित दिशा देनी होगी. अन्यथा देश को दल दल में गिरने से बचाना असंभव हो जायेगा. (SA-187D)

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
13/06/2016

आदरणीय अग्रवाल साहब, सादर अभिवादन! आपकी चिंता जायज है, कानून बनकर मीडिया पर प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए. सही है, पर कानून बन जाने से ही तुरंत पालन होने लगता है? वैसे भी प्रेस कौंसिल है इसपर नियंत्रण के लिए पर वह कितना नियंत्रण रख पाता है यह भी पाता है. कोई चैनल जब सरकार का गुणगान करता है तो उसे पारितोषिक भी मिलता है. दुसरे चैनल शायद उनकी फाउंडिंग कहीं और से होती होगी तो वे सरकार के अवगुण ढूढने लगते हैं. असल निर्णायक तो जनता या कहें समझदार जनता होती है. मगर समझदार जनता किसे मन जाय. सभी किसी न किसी पार्टी ले समर्थक या विरोधी हैं. तात्पर्य यही है की हमलोग सिर्फ चिंता ही जाहिर कर सकते हैं. सोसल मीडिया पर भी पार्टियों के गट बने हुए हैं. इसीलिये जनता को ही फैसला करने दीजिये. सरकार का काम है की कैसे अपराध रुके, और विकास सब तक पहुंचे. अगर मैं गलत हूँ तो बताएं! सादर!

    SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
    22/06/2016

    श्रीमान सिंह साहेब,आपकी बात शत प्रतिशत सही है.परन्तु एक लेखक का कर्तव्य है की वह पाठक के समक्ष वास्तविकता रखे उसे अवगत कराये.धन्यवाद


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