jara sochiye

समाज में व्याप्त विक्रतियों को संज्ञान में लाना और उनमे सुधार के प्रयास करना ही मेरे ब्लोग्स का उद्देश्य है.

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कानून बनाने से भी अधिक आवश्यक है जन जागरण अभियान

Posted On 6 Oct, 2016 Junction Forum, Social Issues में

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दहेज़ को रोकने के लिए अनेक प्रकार के कानून बनाये गए, क्या दहेज़ प्रथा पर अंकुश लग पाया ?जैसे जैसे दहेज़ सम्बन्धी कानून सख्त होते गए दहेज़ के रेट बढ़ते गए.न दहेज़ लेने वाले रुके और न दहेज़ देने वाले रुक पाए.पहले दहेज़ खुलेआम दिया जाता था अब सब कुछ अन्दर खाने अर्थात नंबर दो में होने लगा.देश में काले धन को प्रश्रय मिला.
दहेज़ हत्याओं पर अंकुश लगाने के लिए बहुत ही सख्त कानून और धाराएँ बनायीं गयीं परन्तु दहेज़ को लेकर होने वाली हत्याओं पर तो अंकुश नहीं लग सका, बल्कि वधु पक्ष द्वारा इन कानूनों का दुरूपयोग किया जाने लगा. समाज में विवाह नाम की संस्था पर ही शक के बदल गहराने लगे.दहेज़ विरोधी कानून एक सामाजिक शोषण का माध्यम बन गया.परिवारों में अविश्वास का वातावरण बनने लगा.नववधु पति परिवार के लिए आतंक का पर्याय बन गयी.
देश में लिंग अनुपात को बिगड़ने से रोकने के लिए अल्ट्रा साउंड के समय लिंग की पहचान बताना अवैध कर दिया गया ताकि कन्या भ्रूण हत्या पर नियंत्रण किया जा सके. परन्तु इस कानून बनने से न तो डॉक्टर बाज आये और न ही पुत्र की चाहत रखने वाले दंपत्ति अपनी हरकतों से बाज आये.सिर्फ पैथोलॉजी डॉक्टर को अधिक धन मिलने लगा और सब कार्य जस का तस चलता रहा. अनेक राज्यों में बेटियों की संख्या अप्रत्याशित रूप से घटने लगी.
बलात्कार को रोकने के लिए अनेकों सख्त से सख्त कानून बनाये गए क्या बलात्कार की घटनाएँ कम हुईं? जिन पुरुषों की परवरिश ही गलत वातावरण में हुई हो उन्हें आगे पीछे सोचने की समझ ही नहीं होती, ऐसे दरिन्दे समाज के लिए कोढ़ हैं. जिन्हें कानून बनाकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता. नित्य बढती बलात्कार की घटनाएँ बताती है की हमारे समाज में कितनी विकृतियाँ आ गयी हैं, जिसके लिए हम सभी अभिभावक जिम्मेदार हैं, जो बच्चो को अच्छे संस्कार नहीं दे पा रहे हैं.जिनके मन में महिला सिर्फ एक भोग्य वस्तु के रूप में पैठ बना चुकी है. महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना उत्पन्न नहीं कर पा रहे हैं.
बिहार में शराब बंदी की गयी परन्तु क्या लोगो ने शराब पीना बंद कर दिया? राज्य सरकार ने शराब की बिक्री पर पाबन्दी लगा दी जो एक बहुत ही सराहनीय कदम था, परन्तु शराब पीने की लत नहीं छूट सकी और शराब के गुलाम दोगुने या चार गुने दाम देकर अपनी प्यास बुझाने लगे. शराब बिक्री का अवैध धंधा फलने फूलने लगा शराब की तस्करी के अनेक तरीके खोजे जाने लगे,परन्तु शराब पीने वालों की आदतों पर नियंत्रण नहीं किया जा सका.
उपरोक्त सभी उदाहरणों से सिद्ध होता है की कोई भी कानून जनता के मध्य व्याप्त बुरायियों को समाप्त नहीं कर सकता है.कानून का महत्व तब ही प्रभाव शाली हो सकता है जब जनता को भी उन बुराईयों से जागरूक किया जाय उसमें नैतिकता का भाव पैदा किया जाय.किसी भी सामाजिक बुराई को योजना बद्ध तरीके से जन जागरण किया जाना आवश्यक है और उक्त बुराई को लेकर आम व्यक्ति की समस्याओं का निराकरण किया जाना भी अति आवश्यक है.जनता के प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक उत्थान किया जाना आवश्यक है तत्पश्चात ही किसी भी सामाजिक बुराई को नियंत्रित किया जा सकता है, तब ही सम्बंधित कानून अधिक प्रभावी रूप से समाज के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकेगा.(SA-196B)

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Dr shobha Bhardwaj के द्वारा
07/10/2016

श्री आदरणीय सत्य शील जी कानून बनाने के बाद सख्ती से उनका पालन कराना चाहिए कठोर विधान की जरूरत होनी चाहिए

    SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
    09/10/2016

    शोभा जी, कड़े कानून बनाकर भी कोई हल नहीं निकलेगा जब तक जनजागरण न हो.प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आभारी हूँ.

Jitendra Mathur के द्वारा
07/10/2016

शत-प्रतिशत सहमत हूँ मैं आदरणीय सत्यशील जी आपसे । चरित्र-निर्माण के बिना किसी भी कानून का कोई अर्थ नहीं है । हमारे देश की अधिकतर समस्याओं की जड़ ही विवेकहीनता, जड़ता एवं चरित्रहीनता हैं । उनका उपचार कोई कानून नहीं, सामाजिक जागृति है । वैसे भी जो भी नए कानून बनते हैं, वे उनकी भ्रष्ट प्रवर्तक एजेंसियों के लिए अपनी ज़ेबें भरने के नए उपकरण ही सिद्ध होते हैं क्योंकि उनका उद्देश्य क़ानूनों का पालन करवाना नहीं बल्कि तोड़ने वालों से वसूली करना होता है ।

    SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
    07/10/2016

    माथुर साहेब, आपने बिलकुल सही फ़रमाया सिर्फ कानून तोड़ने वालों के लिए कानून बनाकर भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा देना है.

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
07/10/2016

आदरणीय सत्यशील अग्रवाल जी अभिवादन । आपके विचारों से पूरी तरह सहमत । सिर्फ कानूनों से कुछ नही होगा । लोगों मे जागरूकता व नैतिक बोध हो । अच्छा लेख ।

    SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
    07/10/2016

    बिष्ट साहेब , अपनी सार्थक टिप्पड़ी देकर उत्साह वर्द्धन करने के लिए धन्यवाद


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