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सेरोगेसी प्रथा कितनी उचित?

Posted On: 16 Mar, 2017 मेट्रो लाइफ में

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गत सप्ताह एक खबर आई है की मशहूर फिल्म प्रोडूसर करण जोहर दो बच्चों अर्थात एक लड़का और एक लड़की के एकाकी पिता बन गए हैं. अभी कुछ समय पूर्व लगभग नौ माह पहले जितेन्द्र के बेटा  और बॉलीवुड एक्टर तुषार कपूर भी सेरोगेसी द्वारा ही एक बच्चे का एकाकी पिता बन  चुका है. यह खबर आज एक चर्चा का विषय बन गयी है.क्या किसी एक व्यक्ति पुरुष या स्त्री को एकाकी पिता या माता बनना उचित है?.क्या इस प्रकार से यह नवीन तकनीक का दुरूपयोग है या सदुपयोग? क्या सेरोगेसी प्रथा मानवता के विरुद्ध है अथवा सेरोगेसी माँ बनने वाली महिला का शोषण है? क्या सेरोगेसी प्रथा का धार्मिक द्रष्टि से विरोध करना उचित है? क्या गोद लेने की प्रक्रिया को प्रेरित किया जाना अधिक मानवीय होगा? ऐसे अनिगिनत प्रश्न  मानस पटल कर उभर कर आ रहे है.

अब तो सेरोगेसी प्रथा एक आम चलन बनती जा रही है. इस तकनीक द्वारा कोई भी लड़का या लड़का बिन ब्याहे माता या पिता का सुख प्राप्त कर सकता है.कोई भी दंपत्ति जिसके संतान उत्पत्ति की सम्भावना ख़त्म हो चुकी हो,या कोई माँ प्रसव पीड़ा से बचने के लिए कोख किराये  पर लेना चाहती हो तो धन बल से सेरोगेसी मदर की सेवाएं ली जा सकती हैं. क्या इसे धनवान व्यक्तियों द्वारा एक गरीब की भावनाओं से खिलवाड़ माना जाय? किसी गरीब महिला की गरीबी,लाचारी या विवशता का लाभ लेना माना जाय? विदेशों में सेरोगेट मदर की सेवाएं लेना भारत के मुकाबले कही अधिक है अतः वे भारत में आकर यहाँ की महिलाओं की सेवाएं प्राप्त करते हैं. क्या विदेशी मुद्रा कमाने के लिए सरकार द्वारा सेरोगेसी व्यापार को अनुमति प्रदान करना उचित है?

कानून क्या कहता है;

अभी इस तकनीक को लेकर चली प्रथा के लिए स्पष्ट कानून नहीं है, यद्यपि विदेशी दंपत्ति अनेक वर्षों से भारत आकर इस तकनीक का लाभ लेते आ रहे हैं. हमारे वर्तमान कानून के अनुसार(सेरोगेसी कानून 2002) कोई भी महिला जिसकी उम्र कम से कम पैंतीस वर्ष होनी चाहिए और वह अधिकतम पांच बार इस प्रकार से माँ बन सकती है.संतान की चाह रखने वाले दंपत्ति को बनने वाली सेरोगेट मदर से एग्रीमेंट करना होता है की वह अपने देश में उसे नागरिकता प्रदान कराएगा और सेरोगेट महिला को समझौते के अनुसार पर्याप्त रकम देगा और उसके स्वास्थ्य एवं खान पान की उचित व्यवस्था करेगा. परन्तु स्वदेशी इच्छुक दम्पति सेरोगेट मदर को उचित रकम देते हैं या नहीं,उसके खान पान की उचित व्यवस्था करते हैं या नहीं उसके लिए कोई विशेष व्यवस्था सरकार की ओर से नहीं है. यही वजह है की बनने वाली सेरोगेसी माँ के शोषण की घटनाएँ सुनने में नित्य आती  हैं. कुछ बिचौलिये सेरोगेट महिला की मजबूरी या गरीबी का लाभ उठाते हुए ग्राहक से प्राप्त धन का अधिकांश हिस्सा हड़प जाते हैं और सेरोगेसी अपनाने वाली महिला को बहुत कम हिस्सा देकर रफा दफा कर दिया जाता है. दुर्भाग्यवश यदि संतान विकलांग उत्पन्न होती है तो ग्राहक बच्चे को अपनाने से इंकार कर देता है ऐसी स्थिति में महिला का जीवन भयंकर कष्टकारी हो सकता है. महिलाओं के शोषण को रोकने के लिए यदि इस प्रथा पर पाबन्दी लगा दी जाती है, तो चोरी छिपे होने वाले सेरोगेसी के व्यापार में महिलाओं का शोषण और भी अधिक हो जाने की पूरी  पूरी सम्भावना है. अतः इस व्यवसाय पर पाबन्दी लगाना एक गैर कानूनी व्यापार को आमंत्रण देना होगा. अतः आवश्यकता है एक ऐसे कानून की जो सेरोगेट मदर बनने वाली महिला का आर्थिक या शारीरिक शोषण रोक सके. उसके अधिकारों की प्रभावकारी ढंग से रक्षा की जा सके.

एक कानून अभी संसद में विचारणीय अवस्था में पड़ा है जिसके अंतर्गत प्रावधान किया जा रहा है की सेरोगेट मदर बनने वाली महिला इच्छुक दंपत्ति का सम्बन्धी होना चाहिए और कोई भी महिला सिर्फ एक बार सेरोगेट मदर बन सकेगी. इस कानून के बनने पर  विदेशी दंपत्ति के लिए बच्चा प्राप्त करना असंभव हो जायेगा. देश को विदेशी मुद्रा का नुकसान तो  होगा ही, साथ ही गरीबी की  मार झेल रही महिला के लिए इस तकनीक से अपने आर्थिक हालात सुधारना संभव नहीं होगा. कानून अभी अंतिम अवस्था तक पहुँचने से पूर्व परिवर्तन  भी किये जा सकते हैं.

कानून को अंतिम रूप देने से पूर्व इसके मानवीय पहलू पर भी अध्ययन किया जाना चाहिए.

“यह तकनीक गैर शादी शुदा, तलाक शुदा महिला,यौन सम्बन्ध में अक्षम पुरुष,विधवा महिला या विधुर पुरुष,शारीरिक  कारणों या गंभीर बीमारी के कारण बच्चे उत्पन्न न कर सकने वाले दंपत्ति  के लिए वरदान साबित हो रही है.दूसरी ओर एक महिला जो गरीबी की मार झेल रही है,जिसके परिवार में कमाने वाला कोई नही है या किसी महिला का पति किसी दुर्घटना के कारण या लम्बी बीमारी के कारण परिवार का आर्थिक भार उठा पाने में असमर्थ है, के लिए अपने सभी न्यूनतम आवश्यकताओं को पूर्ण करने का साधन भी है”

“इस प्रथा को लेकर कुछ विसंगतियां  भी है, धार्मिक मान्यताओं से जुड़े लोग इस प्रथा को गैर धार्मिक और असमाजिक मानते हैं. यह व्यवसाय दलालों के माध्यम से चलते है अतः बिचौलिये अपने लाभ के चक्कर में सेरोगेट महिला का शोषण करते है ग्राहक से विपुल राशी मिलने के बावजूद महिला को बहुत ही कम धनराशी दी जाती है उसके स्वास्थ्य की पर्याप्त देख भाल भी नहीं हो पाती. इस धंधे से जुड़े डॉक्टर भी अपनी  आमदनी के लालच में महिला को बरगलाते है और स्वयं मोटी फीस बसूलते है. जिस कारण महिला का शोषण होता है जो एक अमानवीय कृत्य है.”

“ दम्पति द्वारा लिए जा रहे बच्चे के पालन पोषण और अच्छे भविष्य की कोई गारंटी सुनिश्चित नहीं होती और न ही उसकी किसी सरकारी एजेंसी द्वारा जांच होती है. यदि एकाकी पुरुष या महिला उक्त विधि से बाप या माँ बनता है तो उसके लिए बच्चे का पालन पोषण आसान नहीं होता क्योंकि बच्चे को कम से कम दस वर्ष की उम्र तक माता और पिता दोनों का सहयोग चाहिए होता है.यही वजह है करण जौहर या तुषार कपूर के पिता बनने  पर इस विषय पर चर्चा तेज हो गयी है और एक संवेदन शील कानून की आवश्यकता अनुभव की जा रही है.”

अतः कानून बनने से पूर्व कानून की समस्त धाराओं पर उदारता पूर्वक विचार किया जाना आवश्यक है.ताकि एक संवेदन शील कानून बन सके और सेरोगेट बनने वाली महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हो सके.                                                               वेबसाइट—www.jarasochiye.com पर भी उपलब्ध.

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